श्री राणी सती दादी सम्पूर्ण मंगल पाठ — पाँच स्कंधों में दादी जी का सम्पूर्ण मंगल चरित।The complete Mangal Path of Shree Rani Sati Dadi — the full devotional life-story recited in five cantos (skandh).
Canto Iप्रथम स्कंध
॥श्री नारायणी चरित मानस॥
॥श्री राणी सत्यै नमः॥
श्री नारायणी चरित मानस
卐 ॐ 卐
-: प्रथम स्कन्ध :-
देवी प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
॥भाषा-टीका॥
शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवी,
हम पर प्रसन्न होओ।
सम्पूर्ण जगत की माता! प्रसन्न होओ।
विश्वेश्वरी! विश्व की रक्षा करो।
देवी! तुम्हीं चराचर जगत की अधीश्वरी हो॥
॥दोहा॥
प्रथम गौरिसुत गणपति का, मन में धर ध्यान।
राणी सती के चरित का, सुंदर करूं बखान॥१॥
मात शारदे कृपा करो, बुद्धि करो प्रदान।
आस मेरी पूरण करो, दे सुंदर वरदान॥२॥
ब्रह्मा, विष्णु, महेश के, चरण कमल सिरनाय
माँ ब्रह्माणी, पार्वती, लक्ष्मी करो सहाय॥३॥
दादी के कुलगुरू प्रभु, कृष्णचन्द्र भगवान।
तिनके चरणकमल नऊँ, महादानि अनुमान॥४॥
नमन करूं गुरूदेव का, जपूं निरंतर नाम।
पास रहो हरदम सदा, निशदिन आठों याम॥५॥
मात पिता के पदकमल, सुमिरूं चित्त लगाय।
जिनकी सेवा से सभी, भवबन्धन कट जाय॥६॥
देव, दनुज, नर, नाग, अरू सतियों को सिरनाय।
जड़, चेतन, चर, अरू अचर, सबको शीश नवाय॥७॥
राणी सती के पदकमल, का मन में धर ध्यान।
नारायणी के चरित का, मन से करूं बखान॥८॥
॥चौपाई॥
सत की महिमा अमित अपारा।
वेद शास्त्र पाये नहीं पारा॥
पारवती, लक्ष्मी, ब्रह्माणी।
सत के बल पर बनी भवानी॥
सावित्री ने सत के बल से।
छीन लिया था पति को यम से॥
सती सुलोचना रामादल से।
पती शीश लाई रघुवर से॥
सीता सतवंती गुण खानी।
तेज पुंज रघुवर महारानी॥
सतभामा, रुकमण, राधाजी।
सत से वाम भाग हरि राजी॥
सत की महिमा सदा सुहाई।
बार-बार कवियों ने गाई॥
सत की महिमा रघुवर जानी।
अपने मुख से आप बखानी॥
॥दोहा॥
सत की महिमा अगम है, कैसे करूँ बखान।
शेष, शारदा, शचिपति, भी न कर सके गान॥९॥
॥चौपाई॥
तदपि सकल सतियन सिर नाई।
मन में दृढ़ विश्वास बनाई॥
शारद गणपति करो सहाई।
कृपा करो राणी सती माई॥
कलयुग में प्रगटी मेरी माई।
सबको सत की राह दिखाई॥
नाम लेत उतरहि नर पारा।
मुद मंगलमय नाम तिहारा॥
मंगल खानि, अमंगल हारी।
नाराणी तेरो नाम सुखारी॥
बहुरि सबहि सादर सिरुनाई।
करउँ कथा मुद मंगल दाई॥
कवि न होऊ नहीं वचन प्रवीना।
दादीजी का शरणा लीना॥
तुलसीदास चरण सिर नाऊँ।
जाकी कृपा चरित लिखपाऊँ॥
॥दोहा॥
पुनि नाराणी पद कमल, का मन में घर ध्यान।
विमल कथा सत की कहूँ, भक्त सुनो दे ध्यान॥१०॥
॥चौपाई॥
सादर शिवहिं नाइ अब माथा।
बरनऊँ राणी सती गुणगाथा॥
सम्वत् दो हजार बत्तीसा।
करहुँ कथा हरि पद धरि शीशा॥
सोमवार नवमीं का शुभ दिन।
दरस दिया दादी ने जिस दिन॥
मास पुनीत सुदी आश्विन का।
पूर्व दिवस विजयादशमी का॥
सकल सुमंगल दायक गाथा।
कहहुँ कथा धरनी धर माथा॥
पूर्व जन्म की कथा सुहाई।
बरनऊँ सती चरण सिर नाई॥
महाभारत विख्यात लड़ाई।
सकल जगत जानत मेरे भाई॥
दुर्योधन एक दिवस विचारा।
कैसे जीतूं रण दुस्तारा॥
चक्रब्यूह कल्पना बनाई।
तेहि पल अर्जुन थे घर नाई॥
अर्जुन संग कृष्ण भगवाना।
दुर्योधन मन में अनुमाना॥
पाण्डव दल में खबर कराकर।
रचा व्यूह योजना बनाकर॥
चक्रव्यूह को तोड़न रीती।
केवल अर्जुन को थी प्रतीति॥
धर्मराज मन चिंता छाई।
करहिं विचार करूँ क्या भाई॥
तेहि अवसर अभिमन्यु आया।
ताऊजी को शीश नवाया॥
॥दोहा॥
शीश नवाया तात को, क्यों कुम्हलाया गात।
धर्मराज किस सोच में, ऐसी क्या है बात॥११॥
॥चौपाई॥
कहहु तात चिंता केहि हेतू।
मुख पर ये ग्लानि केहि हेतू॥
धर्मराज कह सुनु चितलाई।
कठिन ब्यूह की रचना बनाई॥
केवल अर्जुन लड़ सकता था।
चक्रब्यूह भंग कर सकता था॥
अर्जुन करे सुदूर लड़ाई।
एहि कारण चिंता घिर आई॥
धर्मराज चिंतामय जाने।
अभिमन्यु ने वचन बखाने॥
तोड़न चक्र तात जाऊँगा।
रण कौशल अब दिखलाऊँगा॥
भीम कहे सुनु कहन हमारा।
अति कोमल है राजकुमारा॥
कृष्ण बहन का प्राण पियारा।
अर्जुन की आँखों का तारा॥
हाथ जोड़ बोला अभिमन्यु।
योद्धा का सुत है अभिमन्यु॥
॥दोहा॥
शीश नवा बोला तभी, अर्जुन पिता हमार।
कृष्ण बहन माता मेरी, गुरु है द्रोणाचार॥१२॥
॥चौपाई॥
सुनहु तात गुप्त एक बाता।
बैठे बतलाये पितु माता॥
तेहि दिन पितु द्रोण गुरु पाही।
रचना चक्रब्यूह पढ़ आही॥
चक्रब्यूह रचना समझाये।
माता सुनती ध्यान लगाये॥
मैं था मात गर्भ के मांई।
जब पितु ने यह कला बताई॥
ब्यूह को तोड़ बाहर आने की।
रीत बताई जब आगे की॥
सुनहु बात तेहि अवसर ताता।
आगई नींद सो गई माता॥
एहि कारण बाहर आने की।
रीत न सीख सका इस रण की॥
चक्र तोड़ वापस आऊँगा।
श्री चरणों में शिर नाऊँगा॥
विदा कीन्ह उत्तरा हरषकर।
माथे तिलक कियो माँ हंसकर॥
(तर्ज-राधेश्याम रामायण)
रथ किया तैयार सारथी ने, घोड़े सुन्दर जुतवाये हैं।
और सब प्रकार के अस्त्र शस्त्र, रथ के अन्दर रखवाये हैं॥
अभिमन्यु बना के वीर वेश, जब रथ के पास पधारे हैं।
जय घोष हुआ चहुँ ओर सभी ने, आशीर्वचन उचारे हैं॥
जय घोष सुना जब महलों में, उत्तरा बहुत हरषाई है।
पति रण को जाने वाले हैं, झट आरती थाल सजाई है॥
सब सोलह साज बदन पर है, मुख चमके चंदा की नाई।
दासी कर, आरति थाल थमा, वह मुख्य द्वार पर है आई॥
रथ रुका पति का आकर के, अभिमन्यु रथ से उतर पड़े।
देखा जब पति का वीर वेश, प्रेमाश्रु नयन से ढुलक पड़े॥
पति बोले हमको करो विदा, हे मृगलोचनि हरषा करके।
चढ़ गया वीर रस अबला पर, अरु वचन कहे मुसका करके॥
जावो स्वामी रणभूमि में, और विजय प्राप्त करके आना।
छक्के छुट जायें दुश्मन के, तुम ऐसे करतब दिखलाना॥
अभिमन्यु बोले सुनो प्रिये, मैं रण में प्रलय मचा दूँगा।
कौरव दल के महारथियों को, मैं नाकों चने चबा दूँगा॥
लाशों का ढेर लगा दूँगा, हे प्रिया आज रण भूमि में।
शोणित की नदी बहा दूँगा, हे प्रिया आज रण भूमि में॥
नहीं तेरी मांग लजाऊँगा, अर्जुन का पुत्र कहाऊँगा।
बलशाली भीम, युधिष्ठिर का, मैं आज नाम चमकाऊँगा॥
हे प्रिया करो मत तुम चिंता, नहीं माँ का दूध लजाऊँगा।
या तो आऊँगा युद्ध जीत, या वहीं खेत रह जाऊँगा॥
उत्तरा कहे जावो प्रियतम, और माथे तिलक लगाया है।
पति के चरणों का स्पर्श किया, और जय जयकार सुनाया है॥
प्यारी पत्नी से विदा होय, माता को शीश नवाया है।
पय धार लगी बहने माँ के, बेटे को गले लगाया है॥
फिर आशीर्वचन सुना करके, बोली जावो रण भूमि में।
रण देवी तुम्हें पुकार रहीं, जावो बेटा रण भूमि में॥
॥दोहा॥
माता बोली हरषकर, विजयी होकर आय।
बेटा मेरी कोख को, देना नहीं लजाय॥१३॥
॥चौपाई॥
चरण वन्दि कियो वीर पयाना।
संग लिया सारथी सुजाना॥
दौड़ वीर रण भूमि आयो।
रथ को वेग और बढ़वायो॥
रक्षक दल सब पीछे छूटा।
दौड़ लगाई घेरा टूटा॥
चक्रब्यूह के अन्दर जाकर।
मार काट करता बढ़ बढ़कर॥
हा-हाकार चहुँ दिसि माच्यो।
जीवित सन्मुख कोइ न बांच्यो॥
कट-कट मुंड धरण गिरते थे।
हा-हाकार सभी करते थे॥
कटे असंख्य मुंड तेहि काला।
रुंड मुंड शोणित बहनाला॥
छोड़ लड़ाई भागण लागे।
भगदड़ मची फौज भई आगे॥
सप्तरथी मन चिंता छाई।
केहि विधि काबू करें लड़ाई॥
॥दोहा॥
सबने मिल मंत्रणा करी, द्रोण कहे धरि धीर।
मिलकर चारों ओर से, सभी चलावो तीर॥१४॥
॥चौपाई॥
सप्त रथी ने छोड़ सभी को।
घेर लिया उस बाल रथी को॥
बालक एक और रथि साता।
फिर भी लड़ा वीर विख्याता॥
सातों ने मिल तीर चलाये।
अभिमन्यु के गात समाये॥
बालक वीर पड्यो धरनी पर।
शत्रु भी लौटे अति थककर॥
खबर युधिष्ठिर पहुँ तब आई।
कैसी अशुभ बात बतलाई॥
हाय दूत क्या खबर सुनाई।
कैसे कहूँ महल में जाई॥
भीम नकुल सहदेव बतावो।
अभिमन्यु से मुझे मिलावो॥
भीम कहाँ अतुलित बल तेरा।
कित छोड़ा अभिमन्यु मेरा॥
हाय देव मैं काह बिगारा।
काहे दीन्हा दुःख दुस्तारा॥
हाः सुत हाः आँखों के तारे।
पांडव कुल के राज दुलारे॥
धरती माँ मोहे तुमहि बतावो।
अपने अन्दर मुझे समावो॥
आँखों में आँसू की धारा।
सुबक भीम यह वचन उचारा॥
धीरज धारण कीजे भ्राता।
होता वहि जो करे विधाता॥
सुनत वचन बोले विकलाई।
कैसे धीरज धारूँ भाई॥
अर्जुन जब पूछेगा भ्राता।
कहाँ गया अभिमन्यु ताता॥
सुता उत्तरा जब पूछेगी।
अभिमन्यु मुझ से मांगेगी॥
रुदन महान महल में छायो।
तेहि अवसर अर्जुन घर आयो॥
कृष्ण कहे सबको समुझाई।
चिंता छोड़ उठो मेरे भाई॥
॥दोहा॥
अमर नाम अभिमन्यु ने, किया वीरगति पाय।
वंश नाम रोशन किया, सकल जगत के मांय॥१५॥
॥चौपाई॥
मात सुभद्रा तेहि पल आई।
जैसे बछड़ा ढूँढे गाई॥
धर्मराज व्याकुल भये भारी।
भीम, नकुल, अर्जुन, असुरारी॥
नयन नीर ढूंढे चहुँ ओरा।
कहाँ गया अभिमन्यु मोरा॥
कहाँ गया गाण्डीव तुम्हारा।
सौ गज का अतुलित बल सारा॥
चक्र सुदर्शन कहाँ तुम्हारा।
कित भाणज अभिमन्यु प्यारा॥
आ बेटा तेरी मात पुकारे।
क्यों रूठा कुछ तो बतलारे॥
हाय पुत्र तू प्यासा होगा।
नहिं कुछ खाया भूखा होगा॥
आ बेटा तेरा मुख धुलवादूँ।
अपने हाथों तुझे खिलादूँ॥
कैसे अब मैं धीरज धारूँ।
पुत्रवधू से काह उचारूँ॥
एकबार तो धीर बंधादे।
चंदा सा तेरा मुख दिखलादे॥
विकल होय कर होश गंवाई।
सुधि नहिं पड़ी धरण पर जाई॥
तेहि काल बहु रुदन मचाई।
सभा बीच उत्तरा सिधाई॥
बिखरे बाल मांग थी सूनी।
हाथ जोड़ बोली सुनु गुन्नी॥
पती सिधाये यमपुर लोका।
हमको केहि कारण से रोका॥
सति होने की आज्ञा दे दो।
हमको भी पति संग जाने दो॥
॥दोहा॥
बिना पति कुछ भी नहीं, सूना सब संसार।
मात-पिता, सुत, धन सभी, बिन उनके बेकार॥१६॥
॥चौपाई॥
सुनि सबके मुख गये सुखाई।
मुख पर बात एक नहिं आई॥
कठिन समय जाना भगवाना।
बोले वचन हृदय अनुमाना॥
गर्भवती तुम हो मेरी बेटी।
छोड़ो संग जाने की हेटी॥
चक्रवर्ती होगा सुत तेरा।
नाम परीक्षित वचन है मेरा॥
॥दोहा॥
अभिमन्यु से मिलन का, सुनलो सही उपाय।
कलियुग में लेगा जनम, एक वैश्य घर जाय॥१७॥
॥चौपाई॥
सति होने की आस तुम्हारी।
पूरी होगी राजकुमारी॥
कलियुग में जब तू जनमेगी।
शुभ नाराणी नाम धरेगी॥
अभिमन्यु भी कलियुग मांई।
जनमें तनधन नाम धराई॥
तनधन संग रचाय विवाहा।
सति होगी सैं दिन मुकलावा॥
जो जन मेरी भक्ति करेंगे।
मुझसे पहले तुझे नवेंगे॥
घर-घर तेरी पूजा होगी।
क्या गृहस्थ, क्या तापस जोगी॥
जो राणी सती नाम जपेगा।
सुख सम्पति से पूर्ण रहेगा॥
गाँव झुंझुनू वास करेगी।
घर-घर सत की ज्योत जलेगी॥
कन्या ध्यावे घर, वर पावे।
युवती सुन्दर पुत्र खिलावे॥
वृद्धा जपे अमर पद पावे।
व्यापारी धन खूब कमावे॥
॥दोहा॥
रोग, दोष सारे कटें, जो कोई तुझको ध्याय।
वैभव सकल मिले उसे, ‘रमाकांत’ गुणगाय॥१८॥
॥चौपाई॥
रोगी जपे, रोग छुट जावे।
भूत, पिशाच निकट नहिं आवे॥
मंगल उत्सव, ब्याह, सगाई।
पूजा, हवन, कथा सुखदाई॥
सकल काज पल में सवरेंगे।
जो नर तेरा ध्यान धरेंगे॥
पारवती, लक्ष्मी, ब्रह्माणी।
सन्तोषी माता गुण खानी॥
तेरे तन में वास करेगी।
जब तू अग्नि प्रवेश करेगी॥
जदपि अनेक नाम जग मांही।
मेरा वास तेरे मन मांही॥
एहि कारण यह नाम दिया है।
‘नाराणी’ कल्याण किया है॥
कह उत्तरा सुनहु गिरधारी।
शिरोधार्य आज्ञा प्रभु थारी॥
सकल सभा हर्षित भई भारी।
साधु-साधु की ध्वनि उचारी॥
एहि प्रकार कलियुग के मांई।
लियो जनम उत्तरा सुहाई॥
नाराणी सो नाम सुहायो।
कलियुग में आनंद बढ़ायो॥
कथा पुनीत सकल जग जानी।
तेहि ते मैं संक्षेप बखानी॥
पूर्व जन्म की कथा सुहाई।
‘रमाकान्त’ सेवक कह गाई॥
मुख्य कथा अब करूँ अरंभा।
शीश नवाय मात जगदम्बा॥
जेहि विधि किया चरित शुभकारी।
नाम राणीसती दादी धारी॥
बहुरि सकल देवन्ह सिर नाई।
कहहुँ चरित्र कवित्त बनाई॥
॥दोहा॥
भारत देश महान है, जग में है विख्यात।
उसी भूमि पर आयकर, जनम लियो सती मात॥१९॥
गुरु की आज्ञा मानकर, पति पद नेह लगाय।
छोटे से एक गांव में, जनम लिया है जाय॥२०॥
Canto IIद्वितीय स्कंध
॥श्री नारायणी चरित मानस॥
॥श्री राणी सत्यै नमः॥
श्री नारायणी चरित मानस
卐 ॐ 卐
-: द्वितीय स्कन्ध :-
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि॥
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥
॥भाषा-टीका॥
माँ दुर्गे! आप स्मरण करने से सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दुःख, दरिद्रता और भय हरने वाली देवी! आपके सिवा दूसरा कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो॥
॥चौपाई॥
एक डोकवा गाँव सुहाना।
पुरवासी हरि भगत सुजाना॥
गुरसामल व्यापार प्रधाना।
वैश्य जाति का पुरुष सुजाना॥
विनयवान, सुंदर, गुणशीला।
अर्द्धांगिनि सुजान, सुशीला॥
॥दोहा॥
पत्नी सुलोचनी, सुमुखी, पति में दृढ़ विश्वास।
पति अनुकूला प्रेम दृढ़, हरि पद अति विश्वास॥१॥
॥चौपाई॥
अनधन के भण्डार भरे थे।
सब विधि वैश्य भरे पूरे थे॥
गौ, ब्राह्मण गुरु की सेवा से।
गुरसामल प्रसन्न थे मन से॥
दयावान सुंदर मति धीरा।
गौरवर्ण था पुष्ट शरीरा॥
मिर्ची का धन्धा करते थे।
संतों की सेवा करते थे॥
॥दोहा॥
कथा सत्य भगवान की, घर बैठाई आय।
द्विज वर से सुनने लगे, दोनों चित्त लगाय॥२॥
॥चौपाई॥
की आरती अति हरषाकर।
दरस दिया भगवन ने आकर॥
शंख, चक्र, अरु गदा विराजे।
कमल नाल इक हाथ में साजे॥
मोर मुकुट मनि जड़ित सुहाये।
मृग लोचनि मूरत मन भाये॥
गल बैजन्ती माल विराजे।
कांधे बीच जनेउ साजे॥
विप्र चरण वक्षःस्थल सोहे।
पीताम्बरी रुचिर मन मोहे॥
कोटिक काम लजावन हारे।
चकित भये दंपति बिचारे॥
हाथ जोड़ कर वन्दन कीन्हा।
आशीर्वाद प्रभु ने दीन्हा॥
मांगहु जो मन भाय तुम्हारे।
कुछ भी नहीं अदेय हमारे॥
गुरसामल दोउ हाथ पसारी।
बोले वचन सुनहुँ असुरारी॥
सकल भांति हम भये सुखारे।
दर्शन कर भगवंत तुम्हारे॥
हाथ जोड़ बोली सेठानी।
परम प्रसन्न प्रभू को जानी॥
आशा एक यही असुरारी।
बालक खेले गोद हमारी॥
एवमस्तु कह कृपा निधाना।
दंपति हृदय परम सुख माना॥
महाभारत सब कथा सुनाई।
जनमेगी कन्या घर आई॥
आशीर्वाद देय भगवंता।
अंतर्ध्यान भये श्री कंता॥
सुदिन सुमंगल अवसरु आनि।
गर्भ कियो धारण सेठानी॥
जब नाराणी गर्भहिं आई।
मन में मात बहुत हरषाई॥
गुरसामल भी अति हरषाये।
विप्र बुला सस्नेह जिमाये॥
सब प्रकार विप्रन्ह को खुश कर।
द्विज आशीष लई जी भरकर॥
बहु प्रकार दक्षिणा दिवाई।
ब्राह्मण विदा किये सिरु नाई॥
एहि विधि कछुक काल चलि गयऊ।
प्रकट भवानी अवसर भयऊ॥
सम्वत् तेरस सौ अड़तीसा।
परम पुनीत पवन सुत दिवसा॥
बीत गई अष्टमी सुहाई।
कार्तिक शुक्ला नवमी आई॥
मध्य निशा की बेला आई।
प्रगट भई नाराणी बाई॥
बरसइ सुमन जय ध्वनि छाई।
भेर दुन्दुभी गगन सुहाई॥
॥छंद॥
भई प्रकट भवानी सब गुणखानी।
रूप राशि अरु तेज लिये॥
भक्तन सुखराशी घट-घट वासी।
मुख पर तेज प्रकाश लिए॥
माता हरषाई दासी बुलाई।
गुरसामल को खबर करी॥
कन्या जब देखी रूप विशेषी।
मन में बहुत उमंग करी॥
नर नारी डोकवा ग्राम निवासी।
सब मिल जय जय कार करी॥
करि विनय विशाला देव कृपाला।
सुमन वृष्टि नभ जाय करी॥
नर वेश बनाकर देवन्ह आए।
दे दर्शन आशीष दई॥
कलियुग में सत की देवी है।
शिव शंकर ने आशीष दई॥
एहि भांति जनम उत्सव भयो भारी।
निज निज धाम सभी आये॥
यह चरित जे गावहि सती पद पावहि।
“रमाकांत” मस्तक नाये॥
भई प्रकट भवानी सब गुणखानी।
रूप राशि अरु तेज लिये॥
॥दोहा॥
गृह-गृह बाज बधाव शुभ, प्रगट भई सती मात।
हरषवंत सब नारि नर, प्रेम न हृदय समात॥३॥
॥चौपाई॥
गुरसामल मन में हरसाये।
अनधन वस्त्र खूब बँटवाये॥
थी संतान प्रथम दंपति के।
दिये जलाये घर में घी के॥
सुंदर सुता लखी महतारी।
तेरे मुख पर मैं बलिहारी॥
डोकव गाँव के लोग लुगाई।
देखि सुकन्या खुशी मनाई॥
समय जानि द्विज आयसु दीन्हा।
चूड़ाकरण कर्म सब कीन्हा॥
नाम करण कर अवसर जानी।
वैश्य बोलि पठये द्विज ज्ञानी॥
कन्या के है नाम अनेका।
परम विचित्र एक से एका॥
तदपि नाम इक कहऊँ बखानी।
सुंदर नाम धरो ‘नाराणी’॥
अमर सुहागन सुता तुम्हारी।
वैश्य न झूठी बात हमारी॥
रूप राशि शोभा की खानी।
गुरसामल तेरी नाराणी॥
जग में ऊँचा नाम करेगी।
भक्तों के भण्डार भरेगी॥
ऐहि विधि बहुत देहि आशीषा।
विप्र गवन कीन्हो निज देशा॥
॥दोहा॥
सब विधि सबहिं प्रसन्न करी, दम्पति परम सुजान।
सुता प्रेम, हरि भगति में, लगा दियो निज ध्यान॥४॥
॥चौपाई॥
एक बार कियो चरित अपारा।
पाय न सकी मात भी पारा॥
दूध पिलाय रही थी माता।
सुन्यो मात बछड़ा रंभाता॥
बछड़ा गाय एक संग देखी।
दूध पिलाती गैया देखी॥
छोड़ बालिका माता धाई।
बछड़ा गाय तुंरत छुड़ाई॥
माता अचरज में घिर आई।
केवल थे बछड़ा नहिं गाई॥
उधर बालिका रुदन मचाये।
वांय-वांय कह मात बुलाये॥
तुरत मात शिशु पहिं जब आई।
दूध जले की गंध समाई॥
पटक शिशु को माता धाई।
आगी जाकर तुरत बुझाई॥
दूध पड्यो ठंडो मेरी माई।
गंध जले की कैसे आई॥
तुरत सती अग्नि प्रगटाई।
डर गई माता होश गंवाई॥
॥दोहा॥
एहि विधि चरित अनेक कर, बचपन लियो बुलाय।
पाँच बरस की उमर में, विद्या पढ़ने जाय॥५॥
॥चौपाई॥
गुरु गृह जाइ गणेश मनाई।
लगी पढ़न शारद सिरुनाई॥
जो-जो गुरु अनुशासन दीन्हा।
तुरत सीख नाराणी लीन्हा॥
आप सीख सखियन समुझाये।
भांति-भांति के ज्ञान बताये॥
चारों वेद तुरत पढ़ डारे।
भगवद्गीता के गुण सारे॥
विद्या पढ़ गुरु शीश नवाई।
नाराणी अपने घर आई॥
एक चरित मैं कहूँ बखानी।
जेहि विधि डाकिन दूर भगानी॥
डाकिनि एक गांव में आई।
छोटे बालक हर ले जाई॥
नरनारी थे बहुत दुखारी।
नाराणी ने बात बिचारी॥
अंधी कर डाकिनी भगाई।
सुखी भये सब लोग लुगाई॥
मात पिता आज्ञा अनुसरही।
नाना विधि पूजा नित करही॥
विष्णु सहस्र जपे नितनामा।
नित उठकर पितु मात प्रणामा॥
बाल्मीक, तुलसी रामायण।
नियमित करती थी पारायण॥
पूरब जन्म कथा चित आई।
जब महाभारत ग्रंथ उठाई॥
सुमिरि कथा व्याकुलता जागी।
मन में ज्योत सत्य की जागी॥
नाशवान नहिं आनी जानी।
हुयो ज्ञान मन में नाराणी॥
॥दोहा॥
जालीराम दिवान है, उनके घर में जाय।
अभिमन्यु ने जनम लिया, तनधन नाम धराय॥६॥
॥चौपाई॥
पति पहचान चित्त हरसाया।
पारवती का ध्यान लगाया॥
गणपति मात, प्रिया शंकर की।
आश पूर्ण करो मेरे मन की॥
माता आश यही है मन की।
जनम जनम दासी तनधन की॥
प्रगट होय दर्शन सती दीन्हा।
सिर पर हाथ फेर वर दीन्हा॥
नाराणी आशीष हमारी।
पूजहीं मनोकामना थारी॥
सतयुग सावित्री प्रगटाई।
त्रेता सीता सती कहाई॥
एहि प्रकार कलयुग के मांई।
नाराणी तेरा नाम सुहाई॥
आशीर्वाद देय कर अम्बा।
अन्तर्ध्यान भई जगदम्बा॥
मन भावति आशीषा पाई।
हरि भक्ति में चित्त लगाई॥
कार्य करे नित मंगल कारी।
मात पिता लखि होइ सुखारी॥
जेहि विधि होइ सुखी पुरवासी।
वही चरित करती सुखराशी॥
नाराणी ने कला दिखाई।
सुख सम्पति घर घर में छाई॥
॥दोहा॥
एहि प्रकार बचपन गया, कन्या हुई किशोर।
गुरसामल ढूंढण लगे, सुन्दर वर चहुँ ओर॥७॥
जनम चरित जो नित पढ़े, सती पद शीश नवाय।
पुत्र, पौत्र, जस, धन बढ़े, ‘रमाकान्त’ जस गाय॥८॥
Canto IIIतृतीय स्कंध
॥श्री नारायणी चरित मानस॥
॥श्री राणी सत्यै नमः॥
श्री नारायणी चरित मानस
卐 ॐ 卐
-: तृतीय स्कन्ध :-
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
॥भाषा-टीका॥
दैत्यों को मारने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवी! मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो। परमसुख दो, रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय (मोह पर विजय) दो। यश (मोह विजय तथा ज्ञान-प्राप्ति रूप यश) दो, और मेरे काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥
॥चौपाई॥
यह सब चरित कहा मैं गाई।
दूसरी कथा सुनो मेरे भाई॥
जालीराम एक वैश्य सुजाना।
रहते थे दिल्ली जग जाना॥
दयावान, सुन्दर, मति धीरा।
व्यापारी थे अति गंभीरा॥
लेन देन धन्धा करते थे।
खूब भक्ति शिव की करते थे॥
गुणवंती थी नारी सुन्दर।
रहती पति सेवा में तत्पर॥
नारि धर्म पालन करती थी।
साधु संत सेवा करती थी॥
गति अनुसार समय जाता था।
धन्धा भी अच्छा चलता था॥
एक समय की बात बताऊँ।
मति अनुसार प्रसंग सुनाऊँ॥
नगर हिसार अति विख्याता।
जालीराम रुके मग जाता॥
मिली सूचना जब नवाब को।
झट बुलवाया जालीराम को॥
॥दोहा॥
सेनापति झट ले गया, जालीराम को आय।
खास महल में ले गया, झड़चन्द दिया मिलाय॥१॥
॥चौपाई॥
बहु प्रकार आदर देखाई।
राजोचित् कीन्ही पहुनाई॥
राजनीति की बात चलाई।
अर्ध-निशा चर्चा में जाई॥
जालीराम की देखि चतुरता।
बोले वचन नवाब तुरंता॥
सब प्रकार दूँगा सनमाना।
आदर, ओहदा, धन अरु धाना॥
पद दीवान आप अपनालो।
मित्र हमारी बात न टालो॥
क्षण भर सोच किया मन मांई।
कैसे अब मैं करूँ मनाई॥
कह नवाब दीवान सुजाना।
शीघ्र दिल्ली से वापस आना॥
शीश नवा, अनुशासन लीन्हा।
तुरत शयन व्यापारी कीन्हा॥
प्रातःकाल गणेश मनाई।
रथ दिल्ली की ओर चलाई॥
आकर सारी कथा सुनाई।
सुनि हरषी शारद मन मांई॥
जालीराम कहा समुझाई।
चलने की अब करो उपाई॥
॥दोहा॥
नगर हिसार पहुँच कर, डेरा दीन्हा डाल।
काम दिवानी का सभी, जल्दी लिया सम्माल॥२॥
॥चौपाई॥
बहु प्रकार कल्पना लगाई।
राजकाज करते मन लाई॥
ऐसी सुन्दर नीति बनाई।
जालीराम की फिरी दुहाई॥
बांसल गोत्र जाति जालाना।
दो सुत एक सुता जग जाना॥
जेठे सुत थे तनधन दासा।
मात-पिता, गौ, ब्राह्मणदासा॥
रण बांकुर, तलवार प्रवीणा।
तैसा ही व्यापार प्रवीणा॥
सुता एक थी सुन्दर श्यामा।
गुणवंती थी स्याना नामा॥
दूजे पुत्र कमलरामा थे।
सबकी आँखों के तारे थे॥
मात-पिता, भ्राता अनुसारी।
अति विनीत अति आज्ञाकारी॥
॥दोहा॥
जालीराम प्रसन्न थे, मन में सभी प्रकार।
सुत, दारा, धन, धान्य से, पूरे थे भण्डार॥३॥
दयावान परिवार था, पत्नी जालीराम।
तनधन पुत्र सुजान थे, दूजे कमलाराम॥४॥
॥चौपाई॥
गौ, ब्राह्मण सेवा करते थे।
खूब प्रसन्न सभी रहते थे॥
था नवाब का पुत्र सुजाना।
वय किशोर सब भाँति सुहाना॥
राजकुमार, कमल, तनधन जी।
साथ खेलते थे भरकर जी॥
कबहुँ कबड्डी खेल रचाये।
कबहुँक सब मिल दौड़ लगाये॥
कबहुँ जाय जंगल के मांई।
मृगया कर घर वापस आई॥
तनधन, कमलाराम, राजसुत।
चपल तुरग दौड़ाते इत उत॥
घोड़ी थी इक तनधन पाहीं।
सूर्य अश्व भी देखि लजाहीं॥
पीत वदन गति तेज तरारी।
तनधन जी की आज्ञाकारी॥
अश्व दौड़ में चपल तुरंगी।
आगे रहती तनधन संगी॥
॥दोहा॥
राजकुमार विचारे मन, कैसी तुरगि सुहाय।
घोड़ी तो लायक मेरे, मन में गई समाय॥५॥
यह प्रसंग यहिं छोड़कर, चलो डोकवा ग्राम।
नाराणी रहती जहाँ, भक्तों की सुख धाम॥६॥
सेठानी कह सेठ से, हाथ जोड़ सिर नाय।
वर ढूँढो नाराणी हित, इत उत दूत पठाय॥७॥
॥चौपाई॥
गुरसामल ने दास पठाये।
जोशी जी को तुरत बुलाये॥
लखि ब्राह्मण दम्पति सिर नाई।
मन भावती आशिषा पाई॥
वंदि चरण, ब्राह्मण बैठाये।
नाना विधि पकवान जिमाये॥
भोजन बाद आचमन कीन्हा।
आशीर्वाद विप्र पुनि दीन्हा॥
करि पूजा आसन बैठारी।
सुनहुँ विप्र अब बात हमारी॥
नाराणी के लिए विप्रवर।
ढूँढहूँ बेगि एक सुन्दर वर॥
योग्य विवाह हुई नाराणी।
तेरह बरस की उमर सुहानी॥
दम्पति शुभ विचार तुम कीन्हा।
पुनि आशीष विप्रवर दीन्हा॥
बार-बार दम्पति समुझाई।
ब्राह्मण गवन कियो हरषाई॥
देखे वर अनेक नगरों में।
कोई न वीर चढ़ा नजरों में॥
॥दोहा॥
देश विदेश में ढूँढ कर, ब्राह्मण हुयो निराश।
दूल्हा योग्य न मिल सक्यो, पूरी न मन की आस॥८॥
चारूँ दिशा निहार कर, द्विजवर वापस आय।
अच्छा वर नहिं मिल सका, खबर कराई जाय॥९॥
॥चौपाई॥
गुरसामल मन चिंता छाई।
सेठानी भी अति घबराई॥
नींद न रात दिवस नहिं चैना।
नाराणी बोली मृदु बैना॥
चिंता मत लावो मेरी माई।
कहहुँ उपाय एक समुझाई॥
विप्र पठावो नगर हिसारा।
सबहिं भाँति उपकार तुम्हारा॥
बहु प्रकार धीरज बंधवाई।
द्विज वर चले गणेश मनाई॥
सायंकाल नगर नियराई।
जालीराम घर पहुँचे जाई॥
जालीराम को खबर कराये।
विप्र एक द्वारे पर आये॥
आप आई सादर सिरु नाई।
अन्दर तुरत गये लेवाई॥
उचित बास मेहमान दिवाये।
कहु गुरुदेव कहाँ ते आये॥
सकल प्रसंग दीवान सुनाये।
जेहि हित द्वार तुम्हारे आये॥
॥दोहा॥
सकल कथा सुनि विप्र से, मन में अति हरषाय।
अर्धांगी को मुदित मन, बात सुनाई जाय॥१०॥
॥चौपाई॥
सुनि पति वचन मात हरषानी।
नाराणी सब भांति सयानी॥
सुनु प्रियतम बड़भाग हमारे।
गुरसामल बने समधि हमारे॥
नाराणी तनधन की जोड़ी।
जैसे रति अनंग की जोड़ी॥
काढ़ पत्रिका बाँच सुनाई।
हरषित हुई शारदा माई॥
राम-कमल तेहि अवसर आये।
मात-पिता सादर सिर नाये॥
केहि कारण हरषित पितु माई।
तात कहाँ ते पाती आई॥
सकल प्रसंग दीवान सुनाये।
कमलाराम मगन हो धाये॥
मन हरषाय विप्र पहिं जाई।
हाथ जोड़ बोले सिर नाई॥
जीमन हेतु करो प्रस्थाना।
गुरसामल के विप्र सुजाना॥
भांति-भांति के पाक बनाये।
चौकी पर आगत बैठाये॥
हवा करे खुद जालीरामा।
भोजन परसे कमलारामा॥
तनधन और मात कर जोड़े।
खड़े हुये थे बायें थोड़े॥
मन कल्पना करत है भूसुर।
जालीराम धन्य तेरो घर॥
जालीराम के वैभव देखी।
मन प्रसन्न भये अति विशेषी॥
मन ही मन आशीष सुनावा।
हेतु आचमन नीर मंगावा॥
॥दोहा॥
भोजन कर अति प्रेम से, आशीर्वाद सुनाय।
गवन कियो विश्राम हित, मन में अति हरषाय॥११॥
॥चौपाई॥
बहु प्रकार कीन्ही पहुनाई।
की आगत की बहुत बड़ाई॥
आज्ञा हो सो करूँ गुसांई।
आयसु दो बालक की नांई॥
विप्र कहा सुनु बात हमारी।
अब देरी काहे व्यापारी॥
त्रयोदशी इक्कावन सन् का।
करो लगन है हित सबही का॥
नवमी मंगसिर सुदी सुहाई।
उत्तम लगन गौरि सुत ध्याई॥
ले बरात आवो हे नरवर।
हम भी अब चलते अपने घर॥
विदा किये भूसुर हरषाई।
दारा, सुत समेत सिरनाई॥
बहु प्रकार दक्षिणा दिवाई।
चीर, कनक, रथ, घोड़े, गाई॥
॥दोहा॥
विदा कराया विप्र को, आये अपने धाम।
ब्राह्मण भी पहुँचा तुरत, नाराणी के ग्राम॥१२॥
॥चौपाई॥
अति आदर गुरसामल कीन्हा।
आशीर्वाद महीसुर दीन्हा॥
सकल कथा विस्तार बखानी।
गुरसामल ने अति सुख मानी॥
पत्नी को भी तुरत बुलाया।
पक्का हुआ लगन बतलाया॥
अति हरषित बोली महतारी।
देवन्ह बिगड़ी बात सम्हारी॥
अब विलम्ब केहि कारण कीजे।
काम बहुत है जल्दी कीजे॥
॥दोहा॥
विदा किया ब्राह्मण तभी, दम्पती शीश नवाय।
गुरसामल जी लग गये, तैयारी में जाय॥१३॥
यह प्रसंग यहिं छोड़कर, कथा का बदलूँ मोड़।
रुकमण बोली कृष्ण से, शीश नवा, कर जोड़॥१४॥
Canto IVचतुर्थ स्कंध
॥श्री नारायणी चरित मानस॥
॥श्री राणी सत्यै नमः॥
श्री नारायणी चरित मानस
卐 ॐ 卐
-: चतुर्थ स्कन्ध :-
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
॥भाषा-टीका॥
नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो, कल्याण दायिनी शिवा हो, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है।
॥दोहा॥
नाथ हमें बतलाइये, कलि में सत की बात
कौन सती ऐसी हुई, बनी जगत की मात॥१॥
॥चौपाई॥
सतयुग, द्वापर, त्रेता मांही।
अगनित सती हुई जग मांही॥
कलियुग मांही सत की गाथा।
पूछहुँ नाथ जोड़कर हाथा॥
कलियुग के सब लोग दुखारी।
केहि विधि उतरें पार खरारी॥
कृष्ण कहे सुनु प्रिया हमारी।
एक सती है नजर हमारी॥
कौरव पांडव युद्ध हुआ था।
चक्रब्यूह भी रचा गया था॥
अर्जुन सुत अभिमन्यु प्यारा।
जिसने कौरव दल संहारा॥
की बालक ने बहुत लड़ाई।
वीरगति अभिमन्यु पाई॥
नाम उत्तरा प्रिय पत्नी थी।
था संयोग गर्भवती भी थी॥
सती होने से रोक लिया था।
उसी समय वरदान दिया था॥
महासती कलयुग की होगी।
नहीं अगर तू अब सती होगी॥
वहीं उत्तरा जनमी आकर।
तपोभूमि भारत में जाकर॥
गुरसामल घर जनम लिया है।
नारायणी शुभ नाम दिया है॥
अभिमन्यु ने जनम ले लिया।
सुन्दर तनधन नाम दे दिया॥
प्रणय सूत्र में अब बन्धेंगे।
सुखी जगत् के लोग करेंगे॥
रुकमणी बोली मैं देखूंगी।
नाराणी का सत परखूँगी॥
भलेहि प्रिया कह कृपा निधाना।
वेश जोगिया लगे बनाना॥
॥दोहा॥
जोगण रुकमण राधिका, रूप बनायो आय।
जोगी रूप लिया श्याम ने, सत परखन को जाय॥२॥
॥चौपाई॥
अलख जगाई गुस्सामल घर।
बोले हर हर बम शिव शंकर॥
पत्नी समेत आय सिर नावा।
सुता बुला परणाम करावा॥
भले भाग साधू घर आये।
बहुत प्रेम से भीतर लाये॥
चकित हुई नाराणी देखी।
राधा रुकमण अति विशेषी॥
अति आदर पद कमल पखारे।
ले चरणामृत भये सुखारे॥
मान सहित भोजन करवाया।
जल पिलाय आचमन कराया॥
राधा, रुकमण ओर निहारी।
बोले चहुँ दिशि देखि खरारी॥
घर-घर में उत्सव है छाया।
केहि कारण पुर गाँव सजाया॥
नाराणी का ब्याह रचाया।
एहि कारण घर गाँव सजाया॥
गुरसामल बोले कर जोरी।
एक विनती सुन लो प्रभु मोरी॥
॥दोहा॥
कन्या की रेखा पढ़ो, दो भविष्य बतलाय।
सुखी रहे कन्या मेरी, ऐसा करो उपाय॥३॥
॥चौपाई॥
नाराणी का हाथ देख कर।
भाग्य बतावो मन विचार कर॥
नाराणी को तुरत बुलाया।
वाम हाथ उनको दिखलाया॥
हाथ देख बोले मुनि जावो।
तनधन का भी टेवा लावो॥
कह मुनि सुनो उम्र तनधन की।
अब बाकी है थोड़े दिन की॥
अब तुम बात हमारी मानी।
दूजा वर खोजो नर ग्यानी॥
मुकलावा जिस दिन भी होगा।
तनधन यमपुर गामी होगा॥
सुनि मुनि वचन पिता मुरझाये।
माता ने भी होश गंवाये॥
तेहि समय नाराणी उठकर।
बोली बचन हृदय को दृढ़ कर॥
जो कुछ भी भविष्य है मेरा।
फिर भी तनधन ही वर मेरा॥
नहीं दूसरा वर चाहूँगी।
तन मन से तनधन ब्याहूँगी॥
जनम जनम का साथ हमारा।
एहि तज दूसर नहिं भरतारा॥
राधा, रुकमण अति सकुचाई।
मन ही मन अत्यंत शरमाई॥
हाथ जोड़ बोली नाराणी।
सकल भांति मन में अनुमानी॥
॥दोहा॥
नाराणी पहचान गई, ये तो नन्द किशोर।
हाथ जोड़ बोली तुरत, सुनिये माखन चोर॥४॥
॥चौपाई॥
सतयुग, द्वापर में छल करके।
भक्तों को छलते जी भरके॥
छले भगत त्रेता युग मांई।
छलने की पर भूख न जाई॥
अब छल छोड़ दरश दो नाथा।
हाथ जोड़ कर नाऊँ माथा॥
वृन्दावन माखन चोरी की।
अब आदत छोड़ो चोरी की॥
मात पिता को करो सुखारी।
यह प्रसंग भूलें असुरारी॥
राधा, रुकमण ओर निहारी।
हाथ जोड़ आरती उतारी॥
लखि रुकमण बोले छलधारी।
आज पकड़ गई चोरी हमारी॥
तुरत चतुर्भुज रूप बनाया।
नाराणी को दरश दिखाया॥
चरण पकड़ बोली कर जोड़ी।
भली सजी तीनों की जोड़ी॥
मात पिता अवसर अनुमानी।
विनती करी जोड़ जुगपानी॥
आशीर्वाद देय विधि नाना।
अंतर्ध्यान भये भगवाना॥
॥दोहा॥
यह चरित्र कर कृपा निधि, पहुँचे अपने धाम।
माता मन में सोचती, क्या होगा परिणाम॥५॥
॥चौपाई॥
माता कहे पति से बाता।
क्या होगा कुछ समझ न आता॥
दूजा वर खोजो तुम जाई।
इसमें ही अब लगे भलाई॥
बार बार विनती कर जोरी।
कहहुँ नाथ मानो अब मोरी॥
गुरसामल बोले नरग्यानी।
धीरज धरो बात मेरी मानी॥
छोड़ो सब भगवान भरोसे।
वहीं सभी को पाले, पोसे॥
अब यदि तोड़ूँ जाय सगाई।
होगी जग में लोक हँसाई॥
टूट जाय कन्या की सगाई।
कोई नहीं करे अपनाई॥
मान घटे अपनी बेटी का।
लाभ नहीं कुछ इस हेटी का॥
बात मान मत रिस्ता तोड़ो।
अपने टूटे दिल को जोड़ो॥
॥दोहा॥
बाल, नारि हठ, राज हठ, जग में है विख्यात।
जब तीनों हठ पर अड़ें, माने नाहीं बात॥६॥
मात उठी विकलाय कर, बोली वचन सक्रोध।
आँखों से गंगा बहे, गला गया अवरोध॥७॥
(माता का हठ)
कंत हमारी बतियां मानों।
कूवै मँ मत फैंको नाराणी, कंत॥
थे तो मरद हो करड़ी छाती।
दुख पावै थारी नाराणी, कंत॥
नो दस मास गरभ में राखी।
जद देखी सूरत नाराणी, कंत॥
नारी की थे पीड़ा के जाणो।
क्यूँ जीतै जी मारो नाराणी, कंत॥
नाजां की पाली लाडो मेरी।
नाम दुहागण होय नाराणी, कंत॥
ब्याह, शादी में कोई ना बुलावे।
कुसूणी कहलाय नाराणी, कंत॥
कुवै मैं कूद समंदर कुदूँ।
डूँगर सँ फैंकूँ नाराणी, कंत॥
जीते जी न तनधन ब्याहूँ।
पीऊँ जहर पिलाऊँ नाराणी, कंत॥
बिलख बिलख कर होश गंवाया।
‘रमाकांत’ मातानाराणी, कंत॥
॥दोहा॥
होश गंवाये मात ने, पड़ी धरण पर जाय।
गुरसामल भये सोच बस, दुःख न हृदय समाय॥८॥
इधर बुलाया कृष्ण को, नाराणी सिर नाय।
आरत देखा भक्त को, गरुड़ चढ़े प्रभु आय॥९॥
॥चौपाई॥
नाराणी बोली अकुलाई।
अपने गुरु को शीश नवाई॥
यह क्या कर दिया दीनानाथा।
बीच भँवर मत छोड़ो साथा॥
मात पिता की मती फिराई।
जल्दी उनको करो सुखाई॥
पूर्व जन्म की बात बताओ।
तनधन दास रहस्य बताओ॥
हो प्रसन्न बोले जदुराई।
तुम अपनी माता पहिं जाई॥
तू जब जाकर समझावेगी।
माता जल्द मान जावेगी॥
दे आशीष भये अन्तर्ध्याना।
गुरु को सती किया परनामा॥
तुरत मात पहिं दौड़ी आई।
आकर उनको होश कराई॥
जब पत्नी को होश आ गया।
गुरसामल भी बाहर आ गया॥
गंग, जमुन आँखों से बहई।
नाराणी को गले लगा लई॥
फूट फूट कर रोवण लागी।
नाराणी तब कहने लागी॥
काहे अपयश लेवो माता।
तनधन ही तेरा जामाता॥
॥दोहा॥
तनधन को छोई नहीं, चाहे कुछ भी होय।
जीवन, मरण, चिंता नहीं, काहे आँख मिगोय॥१०॥
माता से विनती (घूमर)
म्हारी तनधन से लौ लागी ये माय।
दूजो वर नहि ब्याहूँगी॥
ए माँ……
म्हारो जनम-जनम को सागो ये माय।
अब भी संग नहीं छोङूँगी॥
ए माँ……
सारो जग रूसै, रूसण दे ये माय।
तनधन ही पति चाहूँगी॥
ए माँ……
चाहे छोटी उमर भरतारो ये माय।
उण संग सुरगां जाऊँगी॥
ए माँ……
मैं तो कूद अगन मर ज्यास्यूँ ये माय।
तनधन ने नहिं छोङूँगी॥
ए माँ……
मेरे मन में तनधन भायो ये माय।
मैं भी जिद नहिं छोड़ूँगी॥
ए माँ……
॥दोहा॥
रहे सुहाग या ना रहे, चिंता नहीं तनेक।
भारत की ललना बरे, जीवन में वर एक॥११॥
(गीत)
तनधन को लंज्यो।
मेरी माता आज पहरादे ये॥
तनधन…….
फिर मात हरष कर बोली।
तेरी अब सजवास्यूँ डोली॥
थारै मेंहन्दी हाथ रचास्यूँ।
ए तनधन को लंज्यो॥
मत मेरो दूध लजाज्ये।
तू अमर सुहागण बाजे॥
म्हारो हिवड़ो भर भर आवै ये।
तनधन को लंज्यो॥
जा आशीर्वाद है मोरी।
म्हारे चोपड़ै री रोली॥
यो ‘रमाकांत’ जस गावैजी।
तनधन को लंज्यो॥
॥दोहा॥
माँ हरसाई चित्त मँ, हिवड़ै लई लगाय।
जा, पति से कहने लगी, करो तैयारी जाय ॥१२॥
॥चौपाई॥
जहाँ तहाँ दूतन्ह दौड़ाये।
सगे सम्बन्धी सभी बुलाये॥
स्वर्णाभूषण बनने लागे।
दर्जी कपड़े सीने लागे॥
सकल भवन में रंग कराया।
भांति-भांति का चित्र मंडाया॥
ताल मृदंग बाजने लागे।
शहनाई के सुर भी जागे॥
मुख्य द्वार तोरण बन्धाई।
चौके चारूँ लिए पुराई॥
देश देश के गुनी बुलाये।
भांति भांति पकवान बनाये॥
समाचार पुरवासी पाये।
घर-घर मंगल बाज बधाये॥
एक आय दूजा फिरी जाये।
इत उत खड़े लोग बतलाये॥
जनवासा सुन्दर बनवाया।
सब साधन सब भांति सजाया॥
सुन्दर गद्दे लगे सुहाने।
वस्त्र सफेद लगे बिछवाने॥
तकिये मसनद बहुत मंगाये।
चारों ओर पिलंग बिछाये॥
हरिजन सुन्दर करी सफाई।
सिक्का खूब जमीन भिगाई॥
तेलबान कन्या को चढ़ाया।
विविध भाँति असनान कराया॥
(गीत तेलबान)
हल्दी को रंग सुरंग निपजे मालवेजी।
कंचन बरणी केसरीजी॥
आवे बहुत सुगंध।
निपजे मालवे जी॥
या हल्दी बिन्दायकजी मुलाई।
बाई रिद्ध-सिद्ध र मन कोड॥
या हल्दी सब देव मुलाई।
सगली देव्यां क मन कोड॥
या हल्दी मोजीरामजी मुलाई।
बाई पाना क मन कोड॥
या हल्दी गुरसामलजी मुलाई।
बाई मायड़ क मन कोड॥
॥दोहा॥
तेलबान की रस्म कर, मामो गोद उठाय।
ल्या बनड़ी बैठा दई, उपमा नहीं कहाय॥१३॥
॥चौपाई॥
भामिनि सुन्दर गीत सुनाये।
चढ़ अटारि गणपती मनाये॥
जूँथ, जूँथ मिलि आई सखियाँ।
बहुत प्रकार बनाये बतियां॥
बहुत भांति के मंगल गाकर।
सखियां लगी सजाने आकर॥
लाल चुनरिया दुल्हन सोहे।
रत्नहार मुनिजन मन मोहे॥
मोतियन की माला गल सोहे।
कमर तागड़ी, चूड़ा मोहे॥
पांवों में पाजेब सुहाये।
लाल मोचड़ी अति मन भाये॥
सब प्रकार कीन्हों सिंगारा।
हाथ पाँव मेहन्दी रंग प्यारा॥
॥दोहा॥
एहि प्रकार श्रृंगार कर, सखियां च्यारूँ ओर।
‘रमाकांत’ जस गायसी, होकर प्रेम विभोर॥१४॥
उधर नगर हिसार में, घर-घर मंगलाचार।
जालीराम घर छा रह्यो, उत्सव बड़ो अपार॥१५॥
॥चौपाई॥
पुरवासी दीवान बुलाये।
मन हरषाय सभी चल आये॥
जल्द बरात सजावो जाई।
अब बिलम्ब केहि कारण भाई॥
सुनी बात पुरजन हरषाये।
पुलक वदन अपने घर आये॥
सबने निज निज साज सजाये।
ले सामान जाली घर लाये॥
नाना भांति के रथ होते।
तिन्ह मंह सुन्दर घोड़े जोते॥
सूत, मगध, बंदी, गुण गायक।
चले जान चढि जो जेहि लायक॥
ऊँट, वृषभ, बेसर बहु भाँती।
चले वस्तु भरि अगनित जाती॥
अनगिनती सेवक समुदाई।
सुन्दर साज समान बनाई॥
भांति-भांति पालकी सजाई।
हरषित चले विप्र समुदाई॥
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारी।
लिए आरती मंगल थारी॥
अति आनन्द न जाय बखाना।
गावहिं गीत मनोहर नाना॥
(घोड़ी गीत)
घोड़ी मंगाई सजाकर, बनड़ै की माता।
पीतवरण की घोड़ी, छम छम आई।
गैणा सूँ खूब सजाई, बनड़ै की माता।
गहणां पहराय ऊपर, जीन बंधाई।
मखमल की गादी बिछाई, बनड़ै की माता।
सेहरा बंधा पेचै पर, किलंगी लगाई।
भाभ्यां न बेग बुलाई, बनड़ै की माता॥
भाभ्यो थे जल्दी आकर, काजल लगावो।
नेग घणां चुकवाया, बनड़ै की माता॥
बिन्दायकजी की पूजा कीन्हीं।
घोड़ी चढ्या सिरनाई, बनड़ै की माता॥
भूवा बनड़ै की आरती उतारी।
बहन करी लूण राई, बनड़ै की माता॥
सारी लुगायाँ वारी फेरी उतारी।
दूध पिलायो महतारी, बनड़ै की माता॥
“रमाकांत” थारी घोड़ी गाई।
सोनो खूब लुटायो, बनड़ै की माता॥
॥चौपाई॥
तनधन सुन्दर वेश सजाये।
मनहु मदन सजकर महि आये॥
पीतवर्ण घोड़ी पर राजे।
चाल देख खगराजहिं लाजे॥
कमलराम मित्रों के संगा।
अति प्रसन्न असवार तुरंगा॥
जालीराम गणेश मनाई।
गुरु समेत बैठे रथ जाई॥
॥दोहा॥
चोट नगारे पर पड़ी, भूसुर मन्त्र उचार।
कोकिल कंठा कामिनी, गा रही मंगलाचार॥१६॥
॥चौपाई॥
हरषि बरात कियो प्रस्थाना।
होत सगुन मंगल विधि नाना॥
खर मिलि बाम, गाय मिलि दाँये।
मंगल सगुन बरात बताये॥
बहुत विनोद बराती कीन्हे।
अल्प समय डोकव आ लीन्हे॥
॥दोहा॥
सगुन सुमंगल देख के, गौरि, गणेश मनाय।
जनवासे के सामने, रुके बराती आय॥१७॥
॥चौपाई॥
कन्या पक्ष करे पहुनाई।
मीठे मीठे वचन सुनाई॥
बसन विचित्र पाँवड़े परई।
देखि धनद, धन मद परि हरई॥
सुन्दरतम दीन्हे जनवासा।
जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥
नाराणी बरात पुर जानी।
तब कुछ निज माया प्रगटानी॥
सुमिरि हृदय सब सिद्धि बुलाई।
करहुँ जाय सरबरा सुहाई॥
गुरसामल ठाड़े कर जोड़े।
नाऊ सेवक इत उत दौड़े॥
जालीराम मिले हरषाई।
आ समधी को गले लगाई॥
भांति-भांति के खाद्य मंगाये।
दूध, आमरस भांग बंटाये॥
दूलह देख सकल सुख मानी।
घर-घर नारी करे बखानी॥
कैसा सुंदर दुल्हा आया।
ए सखी सुन सबके मन भाया॥
जनु ब्रह्मा निज हाथ संवारा।
श्याम सलौना कैसा प्यारा॥
॥दोहा॥
एहि प्रकार बेला परम, गौ धूली गइ आय।
पाणिग्रहण की शुभ घड़ी, ‘रमाकान्त’ हरषाय॥१८॥
॥चौपाई॥
सजी बरात निशान बजाई।
तनधन सिर सेहरा बंधाई॥
नाचत नटी बाज रहि भेरा।
आ पहुँचे गुरसामल घेरा॥
तनधन ने घोड़ी पर चढ़कर।
मारा तोरण आगे बढ़कर॥
सासू आरति थाल सजाये।
मंगल गीत लुगायां गाये॥
तोरण, कामण गीत सुहाये।
कोकिल कंठ भामिनी गाये॥
(तोरण)
तोरण आया राइवर थर-हर कांप्या राज।
पूछो सिरदार बनी न कामण कूँण कर्या छ राज।
म्हे कांई जाणा म्हारा जोशी कामण गारा राज।
जोश्यां रो नेग चुकास्यां कामण ढीला छोड़ो राज।
म्हे कांई जाणा म्हारा नाई कामण गारा राज।
नायां रो नेग चुकास्यां कामण ढीला छोड़ो राज।
म्हे कांई जाणा म्हारी सखियाँ कामण गारी राज।
सखियाँ रो नेग चुकास्यां कामण ढीला छोड़ो राज।
(कामण)
बनो कांकड़ आय बिराज्यो जी रस कामणिया।
बनो तोरण आय बिराज्यो जी रस कामणिया।
बनो फेरां आय बिराज्यो जी रस कामणिया।
बनो थापां आय बिराज्यो जी रस कामणिया।
बनो महलां आय बिराज्यो जी रस कामणिया।
॥चौपाई॥
नाराणी बहुत हरषाई।
सुंदर कर जयमाल सुहाई॥
दुलहन ने मन में शर्माकर।
वरमाला पहनाई आकर॥
सुंदर गजरा देख सुखारी।
तनधन नाराणी गल डारी॥
मोद विनोद होत बहु भांती।
आनंद मंगल कही न जाती॥
॥दोहा॥
गौरीसुत शारद मना, गुरु को शीश नवाय।
तनधन हरषित आ गये, बैठे मंडप जाय॥१९॥
॥चौपाई॥
प्रथम गजानन नवग्रह पूजा।
गुरसामल ब्राह्मण पदपूजा॥
पूजे सकल देव सिर नाई।
दूलह से पूजा करवाई॥
सकल भांति श्रृंगार बनावा।
सखियां गाये गीत बधावा॥
नाराणी मन में अति लाजी।
दाहिने तनधन भाग बिराजी॥
बरनि न जाय मनोहर जोरी।
दरस लालसा सकुच न थोरी॥
सम्वत् तेरह सौ इक्कावन।
नवमी मंगसिर सुदी सुहावन॥
गौ-धूली का समय विचारी।
अति सुपास सब भाँति सुखारी॥
पाणी ग्रहण समय शुभ जानी।
कुल गुरु की आज्ञा अनुमानी॥
गुरसामल ने अति हरषाई।
दे दिया कन्या दान सुहाई॥
सकल गांव की ब्याही, जाई।
दान दियो श्रद्धा अनुसाई॥
स्वस्ति वचन भूदेव उचारे।
होन लगे फेरे सुखकारे॥
(गीत)
पहलो फेरो नाराणी लीन्यो।
तो बाई दादोजी न॥
प्यारी हो राम।
रुपिया खूब लुटाया जी राज॥
दूजो फेरो नाराणी लीन्यो।
तो बाई बापूजी न॥
प्यारी हो राम।
अनधन खूब लुटाया जी॥
तीजो फेरो नाराणी लीन्यो।
तो नाराणी मायड़ न॥
प्यारी हो राम।
सोनो खूब बंटायो जी॥
चौथो फेरो बनड़ो लीन्यो।
तो बाई हुई परायी॥ हो राम।
रमाकांत हरषायोजी॥
॥चौपाई॥
फेरे पूर्ण हुए सुख कारी।
मंगलमय स्वर भेर उचारी॥
सातों वचन मांग मन राजी।
दुलहन तनधन वाम विराजी॥
सजि आरती अनेक प्रकारा।
भूसुर मंगल वेद उचारा॥
पूछि विप्र, गुरु, वृद्ध, बड़ाई।
वर दुलहिन से नेग कराई॥
तनधन माथे सेंदुर देही।
वर्णन करे सो है कवि केही॥
॥दोहा॥
देवी देवता पूज कर, थापा धोक दिवाय।
सखियां बोली बीन्द न, देवो श्लोक सुनाय॥२०॥
एक श्लोक पर हीरा देस्यां, दूजे माणक मोती।
तीजै चौथे सोनो देस्यां, मोजीराम की पोती॥२१॥
(श्लोक १)
गुरसामलजी डोकवै का, जालीराम हिसारो।
तनधन दुल्हो आयो सोवणो, सासूजी को प्यारो॥
(२)
साला हेली सारी लुगायां, सारी छोर्या साली।
नाराणी म्हारै घर की शोभा, ज्यूँ चंदा उजियाली॥
(३)
सुसरो म्हारो इन्दर राजा, सासूजी इन्दराणी।
बेटी जाई घणी सोवणी, नाम धर्यो नाराणी॥
(४)
तनधन बनड़ो श्लोक सुनाया, साल्यां नेग चुकाया।
दादीजी की कृपा हुई तो, रमाकांत चित आया॥
॥दोहा॥
जूवे का दस्तूर कर, देवी देव पुजाय।
कंवर कलेवा हो गया, सजन गोठ को जाय॥२२॥
॥चौपाई॥
गुरसामल लिए बोलि बराती।
जीमणवार बैठि बहु पांती॥
बनी अनेक विचित्र मिठाई।
खीर, छरस, नमकीन सुहाई॥
अति प्रमोद जीमें बाराती।
ताना कोकिल कंठा गाती॥
(सीठणा)
म्हारै ये पीछोकड़ गीता ए बचत है
जे कोई सुणबा आवैजी हरीको।
सुणबातो आवै म्हारै बंशीधर लूंटी।
सुण सुण ग्यान बढ़ावैजी हरी को॥
सुणबातो आवै म्हारै जालीराम लूंटी।
सुण सुण ग्यान बढ़ावैजी हरी को॥
सुणबातो आवै म्हारै जुग्गीरामजी लूंटी।
सुण सुण ग्यान बढ़ावै जी हरी को॥
सुणबातो आवै म्हारै कमलाराम मायड़।
सुण सुण ग्यान बढ़ावै जी हरी को॥
॥दोहा॥
सांख जलेबी देयकर, गुरसामल हरषाय।
सत पकवानी जीमकर, जालीराम सुख पाय॥२३॥
(सीठणा)
मैदा को सीरो करूँ, पूड़ी करूँ पचास।
पांचूँ बाँधू आंगली, छठो बाँधू गास॥
मूरख होतो जीमियो, नहीं खोलो म्हारो गास॥
जालीराम के घर सूँ आया, गुरसामल के पास।
सगा जिमाई सात मिठाई, छूट्या म्हारा गास॥
बंशीधरजी सम्हल कर बैठियो, छात परसूँ लाडू आवै गड़गड़ गम, डरपो मत सगीजी न लेजास्यां डरपो मत॥
जालीरामजी सम्हल कर बैठियो, छात परसूँ लाडू आवै गड़गड़ गम, डरपो मत……
जुग्गीरामजी सम्हल कर बैठियो, छात परसूँ लाडू आवै गड़गम गम, डरपो मत……
॥चौपाई॥
मन प्रसन्न जीमें बाराती।
मोद प्रमोद कही नहिं जाती॥
करि जीमण आचमन कराया।
मीठा बीड़ा पान मंगाया॥
॥दोहा॥
सजन गोठ एहि भांति कर, जीमणवार सुहान।
गुरसामल करने लगे, पहरावणी महान॥२४॥
॥चौपाई॥
जालीराम करी पहराई।
मधुर गीत धुनि अति सुहाई॥
(गीत पहरावणी)
आवो आवो मोजीरामजी रा पूत
गुरसामल करो पहरावणी
आवो आवो गुरसामलजी रा पूत
गीगराज करो पहरावणी
॥चौपाई॥
दायज दियो अनेक प्रकारा।
रत्न जड़ित आभूषण हारा॥
वस्त्र कई रेशम, कपास के।
दरी गलीचे कई प्रकार के॥
हाथी, घोडा, ऊँट, रथारी।
दीन्हें बहुत प्रकार संवारी॥
बहु प्रकार मेवा मिष्ठाना।
दिये बहुत भांति पकवाना॥
सकल बराती लिये बुलाई।
आदर सहित करी पहराई॥
नाना वस्तु बरातिन्ह पाई।
जान झुँवारी हुई सुहाई॥
और सकल चाकर थे जेते।
सनमाने समधी सम चेते॥
स्वर्ण, वस्त्र दिये अति सुहाने।
एहि प्रकार दासन्ह सनमाने॥
॥दोहा॥
एहि विधि करि पहरावणी, बरनी कैसे जाय।
जगदम्बा पहरावणी, शारद सके न गाय॥२५॥
॥चौपाई॥
रथ अनेक सुंदर सजवाये।
दासी दास तुरत बैठाये॥
स्वर्ण जड़ित पालकी मंगाई।
नाराणी के लिये सजाई॥
विदा गीत गाये नर नारी।
दे दे सुंदर सीख सुखारी॥
अपने घर जा सुता प्रवीणा।
पति के अनुशासन में रहना॥
सास, ससुर की सेवा करना।
नारी धर्म निभाते रहना॥
देवर, ननद और देवरानी।
सबको रखना हिए लगानी॥
सुचि सेवक, दासी अरु दासा।
सब के मन तुम करो निवासा॥
गौ, ब्राह्मण और संत जनों की।
सेवा करना वृद्ध जनों की॥
जब चलने की बेला आई।
विकल भये सब लोग लुगाई॥
॥दोहा॥
गैया आई दौड़ कर, बचपन से थी साथ।
आँखों में आँसू बहे, चाटण लागी हाथ॥२६॥
॥चौपाई॥
विकल होय के गले लगाई।
भाँ-भाँ कर गाई रम्भाई॥
हांकण लागे लोग लुगाई।
और जोर गाई रम्भाई॥
माता जब समझावन आई।
माँ का मुख चाटण लगि गाई॥
मात चरण चाटण लगि गैया।
जिमि कह तनिक रहने दे मैया॥
रखवाले को तुरत बुलाया।
मुश्किल से नोहरे पहुँचाया॥
दौड़-दौड़ सखियाँ आती थी।
विलख गले से लग जाती थी॥
सकल जगह करुणा रस फूटा।
रोये बिना न कोई छूटा॥
माता बोली गले लगाकर।
मुझे चली किसको सम्भलाकर॥
विलख मात के गल लपटानी।
रो रो कर हिचकी बन्धानी॥
ममता मय सिर हाथ फिराई।
बोली महतारी समझाई॥
अमर सुहागण लाडो मेरी।
पति चरणों में ही गति तेरी॥
सुंदर सीख यही है बेटी।
कभी न करना पति से हेटी॥
पिता ससुर दोउ कुल चमकाना।
मत लाडो मेरी कोख लजाना॥
॥दोहा॥
दुलहन बोली मात को। छाती से लिपटाय।
गुड़िया मेरे साथ की। रखज्यो मेरी नांय॥२७॥
आवत देखा स्वामि को। मात गई विकलाय।
आँसू तो झर झर बहे। वचन निकल नहिं पाय॥२७क॥
॥चौपाई॥
नाराणी चाली सासरिये।
थे धीर बंधावो जाय॥
थारी बेटी चाली सासरिये।
थे धीर बंधावो जाय॥
लाडेसर चाली सासरिये।
थे धीर बंधावो जाय॥
जद कद भी मैं भई अणमणी।
आ गोदी में बैठ गई॥
मीठी मीठी बाताँ सुण कर।
सारा दुखड़ा भूल गई॥
गोदी मँ कुण बैठेगो अब।
समझादे क्यूँ ना आय॥
प्रात समय उठ कीर्तन कर।
मेरो सारो काम कराती जी॥
रामायण को पाठ कदे तो।
वेद पुराण सुणाती जी॥
कुण गीता ज्ञान सुणासी ये।
समझादे क्यूँ ना आय॥
गायां की कुण सेवा करसी।
बाँटो कुण खुवासी ये॥
नाराणी तेरे बिना गोमती।
कैयां चारो खासी ये॥
तेरी गंगा झुर झुर रोवै।
धीर बन्धादे क्यूँ ना आय॥
सूरज देव थे कमती तपज्यो।
तावड़ियो नहिं लग ज्यावै॥
कूँपलसी कोमल मेरी लाडो।
ताप लग्यां कुम्हला ज्यावै॥
सावण ज्यूँ बादल छायां रखज्यो।
थे बेटी पर आय॥
॥दोहा॥
गुरसामल आये तभी, हिये लिया लिपटाय।
धीरवान भी रो पड़े, हिचकी गई बंधाय॥२८॥
॥चौपाई॥
धरि धीरज बोले विकलाई।
बेटी लेना सदा बड़ाई॥
बहु समझा पुनि गले लगाई।
नाराणी पालकी चढ़ाई॥
माता ने आशीष सुनाई।
सदा सुहागिन तूँ मेरी जाई॥
आशीर्वाद दीन्ह सब जावो।
फलो पूत दूध में न्हावो॥
विकल बनाय सकल नर नारी।
नाराणी ससुराल सिधारी॥
तनधन आय सास सिर नावा।
विदा होन हित वचन सुनावा॥
माता बोली अति विकला कर।
कोटि-कोटि आशीष सुनाकर॥
आशीर्वाद यही है मोरी।
जीवो सुत तुम बरस करोरी॥
पुनि गुरसामल चरण पकड़कर।
ली आशीष बहुत जी भरकर॥
॥दोहा॥
पास पड़ोस की भाभियां, आई झुंड बनाय।
ले चाल्या म्हारी नणद न, रखज्यो हिये लगाय॥२९॥
(नणदोई)
प्यारा लागोजी नणदोई म्हानै प्यारा लागोजी।
ओजि बाई नाराणी रा भरतार,
नणदोई…॥
ओजि म्हारी राजकँवर बाई रा श्याम।
नणदोई…
पेचो सोवैजी नणदोई थारे पेचो सोवैजी।
ओजि थारी किलंग्या की जगा ज्योत।
नणदोई म्हाने…..
बाइजी सोवैजी नणदोई थारे बाइजी सोवैजी।
ओजि थारी जोड़ी की जगा ज्योत।
नणदोई म्हानै……
ओजि म्हारा राजकँवर बाई रा श्याम।
नणदोई म्हानै……
॥दोहा॥
गुरसामल आये तुरत, समधी जी के पास।
हाथ जोड़ अति दीन हो, बोले वचन सुपास॥३०॥
॥चौपाई॥
गुरसामल दोउ हाथ पसारी।
केहि विधि करूँ प्रशंसा थारी॥
बहु सनमान दास को दीन्हा।
यहाँ पधार अनुग्रह कीन्हा॥
क्षमा करहुँ अपराध हमारे।
भूल चूक हमने कर डारे॥
नाराणी है सुता तुम्हारी।
रखना प्राणों से भी प्यारी॥
जालीराम बोले मुसुकाई।
दीन्ही सब विधि आप बड़ाई॥
॥दोहा॥
जालीराम बोले तभी, कमलाराम बुलाय।
खूब उछालो रोकड़ा, देवो त्याग चुकाय॥३१॥
॥चौपाई॥
गुरसामल को गले लगाई।
बैठे रथ गौरीसुत ध्याई॥
॥दोहा॥
रामरमी दोनूँ करी, नैन नीर की धार।
गुरसामल घर को चले, जालीराम हिसार॥३२॥
॥चौपाई॥
कर बहु बार अनेक बड़ाई।
समधी सब बरात समुदाई॥
ढोल नगारे, शंख बजाकर।
सब विधि सबको शीश नवाकर॥
गुरसामल को अति समझाकर।
चली बरात गणेश मनाकर॥
॥दोहा॥
ले दुलहन को चल दिये, तनधन अति हरषाय।
‘रमाकांत’ विनती करे, देव सुमन बरसाय॥३३॥
(ओल्यूँ)
टेक॰ ओजी ओ गोरीरा लसकरिया
ओल्यूँडी लगायर थे तो
चाल्या जी बनड़ा॥
थारी तो ओल्यूँ बना म्हे करां
म्हारी तो करियन कोईजी बनड़ा॥
थारी तो ओल्यूँ बनी म्हे करां
म्हारी तो करे म्हारी माय जी बनड़ी॥
चढ़ो तो चढ़ावो बना के करो
क्यूँ तरसावो बालक जीव जी बनड़ा॥
नाराणी पग घाल्यो पागड़े
डब-डब भर आया नैण जी बनड़ा॥
आँसू तो पूँछ्या पीले पेचसूँ
लेई तो हिवड़े लगाय जी बनड़ा॥
(बधावा)
पहल बधावै ए सइयो मोरी म्हे गया राज।
गया म्हारै बाबा जी री पोल मोरी सईयो ए।
चढ़ती बाई न ए सूण भला होया राज।
गया म्हारे बीरांजीरी पोल मोरी सइयो ए।
चढ़ती बाई न ए सूण भला होया राज।
॥दोहा॥
बिदा कराय बरात को, आये घर के मांय।
बिना सुता के भवन में, कुछ भी नहीं सुहाय॥३४॥
बीच बीच बर वास कर, डोली लिए कहार।
ले दुलहन वर आ गये, अपने नगर हिसार॥३५॥
॥चौपाई॥
अति आनंद घर-घर में छायो।
तनधन नाराणी ब्याह ल्यायो॥
मंगलमय शुभ अवसरु जानी।
डोली पहुँची द्वारे आनी॥
सासू ने भर गोद उतारी।
सजि मंगल आरती उतारी॥
ननदी पाई बार रुकाई।
कैसी अच्छी भाभी आई॥
पारवती, लक्ष्मी, ब्रह्माणी।
जैसे उतर मही पर आनी॥
वर दुलहन की नजर उतारी।
अंदर ले गई ननदी प्यारी॥
भाँति माँति के मंगल गाना।
और बहुत से नेग बयाना॥
देवी, खेतरपाल पुजाये।
सोट, सोटकी खेल रचाये॥
नित नूतन आनंद बधाई।
घी, गुड़ मांही हाथ घलाई॥
॥दोहा॥
पग पकड़ानी रसम कर, थाल सुहाग सजाय।
भेंट मिली मन भावती, ‘रमाकांत’ हरषाय॥३६॥
ब्राह्मण, नाई, भाटवर, सबको किया प्रसन्न।
जालीराम लुटा रहे, स्वर्ण, वस्त्र अरु अन्न॥३७॥
॥चौपाई॥
सास सुसर ने अति सुख पाया।
सासू का चित अति हरषाया॥
नाराणी भी अति सुख पाई।
सास चरण में चित्त लगाई॥
नित नव मंगल मोद बधाई।
आ पहुँचा लणिहारा नाई॥
बहुत प्रसन्न करी पहुनाई।
दी नाई को बहुत बड़ाई॥
पूज थली गजबदन मनाई।
दुलहन सादर करी विदाई॥
गांव डोकवा पहुँची आई।
मात पिता ने गले लगाई॥
सास ससुर की करी बड़ाई।
सुनि माता मन में हरषाई॥
सखियां गले मिली सब आकर।
विदा किया सबको समझाकर॥
पति चरणों में चित्त लगाया।
मात पिता का मन हरषाया॥
॥दोहा॥
यह विवाह संवाद जो, नित्य पढ़े चितलाय।
“रमाकांत” निश्चय कहे, मंगल मोद बढ़ाय॥३८॥
Canto Vपंचम स्कंध
॥श्री नारायणी चरित मानस॥
॥श्री राणी सत्यै नमः॥
श्री नारायणी चरित मानस
卐 ॐ 卐
-: पंचम स्कन्ध :-
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
॥भाषा-टीका॥
नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो, कल्याण दायिनी शिवा हो, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है। बुद्धि रूप से सब लोगों के हृदय में विराजमान रहने वाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली नारायणी देवी तुम्हें नमस्कार है।
॥चौपाई॥
मति अनुसार कथा मैं भाखी।
अब सुनहू जो बीच हि राखी॥
शहजादा घोड़ी पाने की।
रचने लगा कला लड़ने की॥
साफ हृदय थे तनधन दासा।
समझ न सके मित्र की आसा॥
बात बढ़ी बातों बातों में।
उठा लिये भाले हाथों में॥
पटका पटकी हुई कठोरा।
तनधन जी का हाथ मरोरा॥
तनधन के मन रीस समाई।
कोल में मुक्का एक जमाई॥
मुरछित होय पड्यो धरनी पर।
तनधन चाल्यो चढ़ थोड़ी पर॥
आय पिता को बात बताई।
शहजादे से ठनी लड़ाई॥
पिता कहे मन चिंता लाई।
बेटा अच्छी नहीं लड़ाई॥
॥दोहा॥
हम सेवक वह शाह है, उनसे कैसा वैर।
घोड़ी के खातिर लिया, नाहक तुमने वैर॥१॥
॥चौपाई॥
जब शहजादा होश में आया।
कपड़े झाड़ तुरत घर आया॥
सकल बात पितु का समझाकर।
कैद करो तनधन को जाकर॥
तुरत नवाब दूत दौड़ाई।
जालीराम को लिया बुलाई॥
बहुत सजनता ज्ञान बताई।
ठंडा किया शाह समुझाई॥
वापस अपने घर को आये।
तनधन को सब बात बताये॥
उधर कुमार विचारे मन में।
तनधन को कब मारूँ रण में॥
तुरत पिता को शीष नवाकर।
बोला बात कठिन जिद्दी कर॥
सुन्दर घोड़ी मैं लेऊँगा।
नहीं अन्न नहीं जल पीऊँगा॥
शाह तुरत सेनापति भेज्या।
कह दीवान को घोड़ी देज्या॥
॥दोहा॥
कह तनधन दीवान से, सादर शीश नवाय।
घोड़ी मैं दूंगा नहीं, चाहे प्राण भी जाय॥२॥
॥चौपाई॥
सेनापति सुनी जब बाता।
जल्दी से सेना बुलवाता॥
दोनों वीर डटे रण मांई।
तनधन दास, कमल लघु भाई॥
मारकाट जब करने लागे।
आगे होकर सैनिक भागे॥
सेनापति को मार गिराया।
सकल फौज को दूर भगाया॥
अगणित सिर वहाँ कटे पड़े थे।
भाले, बाण, कृपाण गड़े थे॥
दूसरी फौज तुरत चढ़ आई।
तनधन कमलाराम भगाई॥
एहि प्रकार बहु सैनिक मारे।
कई मरे, कई थे अधमारे॥
शाह विचार करे मन मांही।
एहि संग वैर भलाई नाहीं॥
दोनों भाई घर को आये।
मात पिता सब हाल सुनाये॥
॥दोहा॥
शारद बोली भय सहित, समझ पड़े कछु नाहीं।
पानी मांही मगर संग, कियां बैर भल नाहिं॥३॥
॥चौपाई॥
शहजादे को नींद न आई।
करे विचार करूँ क्या भाई॥
बहु प्रकार मन में विचार कर।
पहुँचा छुपके जालीराम घर॥
घुड़शाला में पहुँचा जाई।
झट घोड़ी की बाग थमाई॥
हिनहिनाट घोड़ी ने कीन्हा।
एक लात छाती जड़ दीन्हा॥
बहुत जोर घोड़ी हिन्नाये।
घर के सारे लोग जगाये॥
तनधन कर में भाला लेकर।
आ पुचकारा हाथ फेर कर॥
शहजादा फिर डर कर भागा।
तनधन उसके पीछे लागा॥
भाला फेंक निशाना मारा।
उतरा तुरत कलेजे पारा॥
अपनी करनी का फल पाया।
शहजादा परलोक सिधाया॥
॥दोहा॥
पिता कही समझाय कर, सुन बेटे मेरी बात।
जल्दी चलो झुँझुनू, बीत न जाये रात॥४॥
॥चौपाई॥
रातों रात सब साज सजाई।
झुँझुनू जाकर सूर्य उगाई॥
शाह हिसार झुँझुनू शाह में।
थी कटुता दोनों शाहों में॥
एहि कारण दीवान सुजाना।
अच्छा समझा झुँझुनू जाना॥
उधर बहुत सूरज चढ़ आया।
शहजादा घर पर नहीं पाया॥
जालीराम घर पता चलाया।
मरा हुआ शहजादा पाया॥
रह गया शाह बहुत चिल्लाकर।
पा न सका वह तनधन का कर॥
बहु प्रकार मन में पछताये।
बदले की योजना बनाये॥
इस प्रकार श्री जालीरामा।
आकर बस गये झुंझुनू ग्रामा॥
॥दोहा॥
यह चरित्र संक्षेप में, कहा कवित्त बनाय।
‘रमाकांत’ जो भी पढ़े, रण में हार न खाय॥५॥
॥चौपाई॥
धीरे समय चक्र चलता था।
सुखमय सूर्य रोज ढलता था॥
सोचे नाराणी महतारी।
मुकलावे की करूँ तैयारी॥
बारह मास ब्याह को हो गया।
गौने का अब समय हो गया॥
दास भेज नेवगी बुलाया।
गांव झुँझुनू तुरत पठाया॥
मुकलावे का मुहूर्त बताया।
तनधन को जल्दी बुलवाया॥
सब प्रकार सेवक समझानी।
नाई विदा हुआ सुख मानी॥
जालीराम मन करे विचारा।
गाँव दूर है मग दुस्तारा॥
चुन चुन शत योद्धा बुलवाये।
तनधनजी के साथ लगाये॥
अति विश्वास पात्र राणा को।
तनधन सौंपा है राणा को॥
॥दोहा॥
बहुत भांति समझाय के, तनधन राणा साथ।
चले वीर गौना करण, लिए शस्त्र सब हाथ॥६॥
॥चौपाई॥
मात-पिता चरणन सिरनाई।
तनधन चले गणेश मनाई॥
धर-धर कूँचा धर-धर मझला।
पहुँचे दिन ढलने की बेला॥
सबको सुन्दर बास दिवाई।
तनधन को घर गये लिवाई॥
बहुत उछाह सेठ घर छाया।
घर में परमानन्द समाया॥
जब जीमण को बैठे जँवाई।
जीमण गीत लुगायां गाई॥
॥गीत॥
धोया धोया थाल परोस दिया भात जी।
आवो आवो तनधनदासजी बैठो न थालजी॥
बैठो न थाल बतावो थारी जात जी।
बाप म्हारो राजाजी, माय पटराणी जी॥
च्यारूँ भाई चतरसा, भ्हैण सुजान जी।
भूवा म्हारी सोधरा, रसोइयां क मांय जी॥
चाची म्हारी सेठाणी, बा बैठे पीडो ढाल जी॥
॥चौपाई॥
सोवण हेत भवन जब आये।
सखियां खूब मजाक बनाये॥
नित नव होत अधिक पहुनाई।
दिवस सात गए बीत सुहाई॥
राणा तनधन को बुलवाया।
तात समझ कर जल्दी आया॥
॥दोहा॥
चलने का अब साज सजो, हमें हो रही देर।
अब रूकना अच्छा नहीं, बहुत हो गई सैर॥७॥
॥चौपाई॥
तनधन अन्दर कियो जनाई।
विदा करो माता सुखु पाई॥
बचन सुनत माता हरषाई।
सब सखियों को लिया बुलाई॥
जावो सजावो नाराणी को।
सब प्रकार सुन्दर दुलहन को॥
पीठी मल अस्नान कराया।
सुंदर वस्त्र दुलहन पहनाया॥
नाराणी सब विधि शृंगारी।
मन ही मन हरषी महतारी॥
मुख चमके चंदा की नांई।
माथे बिन्दु सुहाग सुहाई॥
घूँघर वारे केस बनाये।
जैसे भंवर समूह सुहाये॥
नैन विशाल भृकुटि है बाँकी।
जिनमें है कजरे की झाँकी॥
दुलहन बनी लगे नाराणी।
जैसे रति जमीन पर आनी॥
रूप राशि की खान भवानी।
कवि करे क्या रूप बखानी॥
सम्वत् त्रयोदशी बावन का।
मंगसिर बदी दिवस नवमी का॥
प्रातः काल का समय सुहाना।
रथ अरु तुरग सजाये नाना॥
॥दोहा॥
सब तैयारी ठीक कर, दहली दई पुजवाय।
बेटी को करदी विदा, रथ में दी बिठलाय॥८॥
सखियां सब रोने लगी, गुड़ियों को ले हाथ।
गुड़िया माँ को सौंपदी, सदा सुलाना साथ॥९॥
॥चौपाई॥
गुरसामल, सासू सिर नाई।
तनधन चले संग सुभटाई॥
माता राणा को समझाई।
संग तुम्हारे मेरी जाई॥
सब प्रकार से रक्षा करना।
प्राणों का तुम मोह न धरना॥
राणा बोले वक्ष फुलाई।
कोई तन को छूले बाई॥
चिंता नेक करो मत माता।
शूर वीर तेरा जामाता॥
होत विलम्ब मात सिर नाई।
चले सकल हरषित सुभटाई॥
चलन हेतु जब रथ को खींचा।
छींक हुई तेहि अवसर बीचा॥
(गीत)
मनड़ो नहीं धारे धीर।
कैयां थाने समझाऊँ जी॥
जब समय विदा का आया।
या छींक कुसूण बताया॥
सामी छींक चल्या जो घर से।
नहीं लौट कर आया॥
हिवड़ै मँ उठ रही टीस।
कैयां थाने चीर बताऊँ जी॥
थाने समझाऊँ जी….
कई देवी, देव मनाया।
कई खेतरपाल धुकाया॥
जद जाकर या कन्या देखी।
मनड़ै में हरषाया॥
म्हे के के कोड कर्या थानै।
कैयां समझाऊँ जी॥
थाने समझाऊँ जी….
सुन राणा बात हमारी।
थारै संग करी सुकुमारी॥
प्राणां को थे मोह न करज्यो।
रखज्यो लाज हमारी॥
थारा सारी उमर गुण गाऊँ जी।
थानै समझाऊँ जी॥
मेरे बूढपणै को सहारो।
तनधन जामाता प्यारो॥
राणा बोल्यो डरपो मत माता।
वचन निभास्यूँ म्हारो॥
यो रमाकांत गुण गावै जी।
थानै समझाऊँ जी॥
॥चौपाई॥
धेनु मिली बांई अकुलाई।
ऊपर से बागल चिल्लाई॥
सबके मन में चिंता छाई।
फिर भी चले गौरिसुत ध्याई॥
॥दोहा॥
तनधन चाले मगन हो, मन में अति हरषाय।
अब वह सुनो जो होनि थी, घोर जंगल के मांय॥१०॥
शहजादे को मार कर, तनधन पिता समेत।
गाँव झुँझुनू बस गये, माता भाई समेत॥११॥
॥चौपाई॥
पुत्र मरण सुनु अति विकलाई।
शाह एक पल मुरछा आई॥
रोने लगा पीट कर छाती।
कहाँ गया तनधन सुत घाती॥
दुखिया पुत्र वधू को देखा।
लगा कलेजे बज्र सरेखा॥
मन में बहुत निराशा छाई।
केहि विधि बदला लेऊँ जाई॥
बेगम बोली वचन सुहावा।
तनधन का होगा मुकलावा॥
कद मुकलावो राखो बेरो।
जाय बीच जंगल में घेरो॥
युक्ति शाह चित्त में आई।
तुरत गुप्तचर दिये पठाई॥
आय गुप्त संदेशा दीन्हा।
तनधन डोकव से चल दीन्हा॥
जल्दी शाह उठा अकुलाई।
आज निकालूँ सब बैराई॥
॥दोहा॥
सेनापति को बोल कर, दीन्ही फौज पठाय।
घाट, बाट सब रोक कर, लीन्ही घात लगाय॥१२॥
तनधन भी कुछ देर में, आये जंगल मांय।
नाराणी, सौ सुभट अरु, संग राणा से राय॥१३॥
॥चौपाई॥
दूर कहीं पर गर्द उड़ाये।
तनधन राणा से बतलाये॥
दिखता है कुछ दाल में काला।
करो उपाय कोई तत्काला॥
एहि प्रकार बतलाये दोऊ।
घेर लिया शत्रु चहुँ ओऊ॥
तलवारें चमकी तेहि काला।
तनधन ने भाला सम्भाला॥
हर-हर महादेव बर बंका।
बजा दिया फिर रण का डंका॥
मारकाट का खेल रच गया।
नर संहार तेज हो गया॥
एक हाथ तलवार सुहाये।
दूजे भाला काल डराये॥
तुरग बाग में मुंह अटकाई।
घुसा अनी के अन्दर जाई॥
॥दोहा॥
मारकाट करने लगे, तनधन के सब लोग।
थोड़े थे, रणचण्डी को, लगा रहे अरि भोग ॥१४॥
॥चौपाई॥
जो शत्रु भी सामने आया।
खा भाला धरनी पर आया॥
वार करे दोनों हाथों से।
घोड़ी भी कुचले लातों से॥
राणा ने शूरता दिखाई।
जो आया यमपुर पहुँचाई॥
साथी लड़े बहुत हरषाई।
एक एक शत शत को खाई॥
घूँघट से नाराणी झाँके।
पति की शूर वीरता आंके॥
सकल फौज को मार भगाई।
किन्तु दूसरी जल्दी आई॥
थोड़े थे तनधन के साथी।
शत्रु अधिक संग थे हाथी॥
फिर भी धन्य हिन्द की नारी।
जनमाये ऐसे बलकारी॥
साथी एक इधर मरता था।
किन्तु प्रलय पहले करता था॥
॥दोहा॥
दूजी बार भी फौज को, दीन्ही मार भगाय।
चलने की जल्दी करो, रथ को दिया बढ़ाय॥१५॥
॥चौपाई॥
सेनापति ने युक्ति बनाई।
सन्मुख जीति न जाय लड़ाई॥
छुपकर अब बैरी मारूँगा।
तनधन का मैं सिर तारूँगा॥
नई फौज ज्यादा मंगवाई।
सहस्र दसेक तुरत चलि आई॥
हुक्म दिया सब सैनिक जाकर।
घेरो जंगल घात लगाकर॥
बना योजना आगे आया।
छुप कर भाला वार चलाया॥
तनधन पीठ घुसा वह जाई।
वीर एक पल मुरछा आई॥
पुनि उठकर तलवार उठाई।
प्रलय विपिन के मांय मचाई॥
गया जिधर कर दिया सफाया।
कोई न जीवित बचने पाया॥
पीछे से शत्रु ने आकर।
वार किया गरदन पर कसकर॥
आँखों से राणा समझाया।
तुरत वीर परलोक सिधाया॥
नाराणी को पड़ी खबर जब।
चढ़ा वीर रस अबला पर तब॥
आँखें लाल अँगारा बन गई।
नाराणी तुरंत ही तन गई॥
॥दोहा॥
याद किया रणचण्डी को, चण्डी बन गया रूप।
कूद पड़ी रण भूमि में, महाकाल का रूप॥१६॥
॥चौपाई॥
एक हाथ में पति का भाला।
दूजे में तलवार कराला॥
कूद पड़ी रणचण्डी रण में।
कटने लगे शत्रु प्रांगण में॥
मार काट करने लगि भारी।
सेना में भगदड़ भई भारी॥
रूप सहस्र धरे रण मांई।
जहँ देखो नाराणी माई॥
शत्रु कट कट महि गिरता था।
जो मरता सद्गति पाता था॥
तलवारें खन खन चलती थी।
खच खच दुश्मन तन घुसती थी॥
हा-हा कार मच्यो रण मांई।
अल्ला अकबर करो सहाई॥
अनी सहस्र थी अबला एका।
लेकिन सत का तेज अनोखा॥
कछुक देर में सकल संहारे।
जो कुछ बचे ते जाये पुकारे॥
तुरत शाह नई फौज भिजाई।
खुद झड़चन्द करे अगुवाई॥
रण में जब नाराणी देखी।
बोला वचन कपट मय पेखी॥
सुन्दरी नाहक क्यों लड़ती है।
क्यों बेमौत आज मरती है॥
पटरानी पद दूँगा तुझको।
सब सुख दूँ अपनाले मुझको॥
सुनत वचन नाराणी बोली।
पहन चूड़ियाँ बैठो डोली॥
ठहर दुष्ट बतलाऊँ तोही।
तेरी ही तलाश थी मोही॥
काटूँ सिर तेरा क्षण मांई।
अगर युद्ध से भाग न जाई॥
इतना कह दौड़ी तेहि ओरा।
घेर लई सैनिक चहुँ ओरा॥
मारु-मारु, धरु-धरु, चिल्लाये।
बहुत भांति हथियार चलाये॥
लेकिन धन्य शूर नारी को।
मार गिराया पल में सबको॥
राणा जो शूरता बताई।
मेरी मति में नहीं समाई॥
नाराणी जो शीश उतारे।
सीधे विष्णु लोक सिधारे॥
दोनों शूर डटे रण मांई।
लाशों का था ढेर लगाईं॥
॥दोहा॥
मारकाट करती हुई, पहुँची झड़चन्द पास।
हाथी पर था चढ़ा हुआ, सेना थी चहुँ पास॥१७॥
॥चौपाई॥
अगणित योद्धा वहाँ संहारे।
पीछे से राणा संहारे॥
शाह विचार करे मन मांई।
यह नारी अब जीति न जाई॥
तेहि अवसर नाराणी बढ़कर।
मारी एड़ घोड़ी को तनकर॥
घोड़ी उछल गई हाथी पर।
मारा एक वार छाती पर॥
आर पार तलवार हो गई।
छाती धड़ से दूर हो गई॥
फौज मांहि भगदड़ भई भारी।
इत उत भागे अनी बिचारी॥
भागी सकल फौज रण त्यागी।
राणाजी की तन्द्रा जागी॥
हाथ जोड़ कर विनती कीन्ही।
तुरत शस्त्र कर से तज दीन्ही॥
फिर राणा से बोली जाओ।
तुरत पति का शव ले आवो॥
राणा युद्ध भूमि में जाई।
धड़ और शीश तुरत ले आई॥
राणा से बोली जल्दी कर।
ईंधन, लकड़ी लाओ चुनकर॥
सूर्य ढले से पहले आना।
हमको तो है पति संग जाना॥
जो आज्ञा कह राणा जाई।
चंदन काष्ट बहुत जुटाई॥
॥दोहा॥
राणा को देरी लगी, सत का तेज दिखाय।
छै बज कर दस मिनट पर, रवि को दिया थमाय॥१८॥
॥चौपाई॥
लाय लकड़ियां ढेर लगाई।
खड़ा रहा फिर शीश झुकाई॥
राणा से बोली पुनि जाओ।
स्नान हेतु जल्दी जल लावो॥
कह राणा जंगल है कठोरा।
पानी नहीं कहीं चहुँ ओरा॥
अपने सत का तेज दिखाया।
कूवा एक तुरत खुद आया॥
चिता तैयार हुई पल मांई।
नाराणी निज हाथ बनाई॥
आप न्हाय पति को नहलाया।
सकल भांति श्रृंगार बनाया॥
तनधन शीश अलग था धड़ से।
जोड़ दिया पल में निज सत से॥
ले पति गात चिता पे चढ़ गई।
राणा की तो हिचकी बंध गई॥
प्रथम चिता की पूजा कीन्ही।
माथे तिलक पति के दीन्ही॥
पद्मासन बैठी महारानी।
राणा से गठ जोड़ मंगानी॥
गांठ जोड़ घूँघटा निकाला।
जैसे दुल्हन बैठी डोला॥
पति के सकल शस्त्र मंगवाई।
सजा दिये पति शीश लगाई॥
॥दोहा॥
राणा था हतप्रभ खड़ा, समझ नहीं कुछ आय।
रोते रोते मात से, बोला अति विकलाय॥१९॥
॥चौपाई॥
हाथ जोड़ बोला सेवक को।
किसके सहारे छोड़ा मुझको॥
झुँझुनू जाय खबर क्या देऊँ।
क्या खुश खबरी माँ को देऊँ॥
बहुत रुदन राणा करता था।
बार बार चरणन पड़ता था॥
माता बोली हाथ उठाकर।
सुनो बात मेरी ध्यान लगाकर॥
चक्रब्यूह महाभारत मांई।
अभिमन्यु रथ हांका जाई॥
अभिमन्यु रण मांय गिराई।
तब तुमने की बहुत लड़ाई॥
तब तुम वीर गति को पाये।
मन में यह अभिलाष बनाये॥
जनम-जनम अभिमन्यु दासा।
हे भगवान यही है आशा॥
एहि कारण इस कलियुग मांई।
जनमे राणा नाम धराई॥
अब चिंता केहि कारण हेतू।
पार लगन हित बांधा सेतू॥
॥दोहा॥
सुनु राणा होनी प्रबल, सीख बताई मात।
हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश विधि हाथ॥२०॥
॥चौपाई॥
अब मानो एक बात हमारी।
अमर नाम होगा बलकारी॥
सत की घर-घर पूजा होगी।
कलयुग का आधार बनेगी॥
मुझसे पहले नाम तुम्हारा।
कलयुग माँई सकल संसारा॥
‘राणासती’ नाम गूँजेगा।
मुझसे पहले तूँ पूजेगा॥
जब भस्मी बन जाय हमारी।
सुन राणाजी बात हमारी॥
तुम पति की घोड़ी ले जावो।
संग हमारी भस्म ले जावो॥
जाय जहाँ घोड़ी अड़ जाये।
वहीं मेरा मंदिर बन जाये॥
कोई न मूर्ति वहाँ पर होगी।
मेरा रूप त्रिशूल पुजेगी॥
भादो बदी अमावस्या को।
मेला लगे प्रति सम्वत् को॥
जो आज्ञा कह शीश नवाया।
आशीर्वाद सुहाना पाया॥
नवमी बदी माह मंगसिर का।
तेरह सौ बावन सम्बत् का॥
सायंकाल की बेला आई।
छै बज कर दस मिनट सुहाई॥
ब्रह्मा, विष्णु और त्रिपुरारी।
चढ़े सकल नभ में असुरारी॥
जय जयकार गगन भयो भारी।
सकल देव जय कार उचारी॥
नाराणी समय शुभ जानी।
याद किया जगदम्ब भवानी॥
अंबा कर त्रिशूल थमाई।
आशीर्वाद दिया हरषाई॥
मात, पिता, अरु सास ससुर को।
कर प्रणाम सब गुरु जनों को॥
हाथ जोड़ देवन्ह सिरु नाई।
शक्ति अनूठी तन में आई॥
मुख पर तेज अनोखा छाया।
दिव्य अनूप रूप बन आया॥
सूर्य देव को शीश नवाई।
चूड़े से अग्नि प्रगटाई॥
लौ निकली एक दिव्य सुहानी।
सकल चिता को ली लिपटानी॥
चिता भभक उठी पल भर में।
मिल गइ जोत जोत पल भर में॥
पति प्राणों में जाय समाई।
जय जय जय नाराणी माई॥
सब देवन्ह जयकार उचारी।
की फूलों की वर्षा भारी॥
तब नव दुर्गा रूप बनाकर।
दरश दिया राणा को आकर॥
ले विमान खुद शचिपति आये।
तनधन और सती बैठाये॥
गरुड़ चढ़े नारायण आये।
नीलकंठ चढ़ नन्दी आये॥
हंस चढ़े आये ब्रह्मा जी।
वाम भाग ब्रह्माणी राजी॥
आशीर्वाद दिये विधि नाना।
सकल देवता कियो पयाना॥
॥दोहा॥
दर्शन पा सती मात का, शीश नवा, कर जोङ।
भस्मी बांधी अश्व पर, तुरग लगाई दौड़॥२१॥
कैर का एक वृक्ष था बन में।
वहीं अड़ा घोड़ा जंगल में॥
अश्व रुका झुँझुनू के मांई।
तुरत भस्म तहँ दी पधराई॥
रोप त्रिशूल आरती उतारी।
घर जाने की बात बिचारी॥
जालीराम खबर जब पाई।
पड़े भूमि पर मुरछा खाई॥
बहु प्रकार माता बिलखानी।
छोटे सुत को गले लगानी॥
तब राणा सब चरित बखाना।
जेहि विधि शाह लड़ाई ठाना॥
बहु प्रकार सब चरित बखाने।
जेहि विधि शत्रु यम पहुँचाने॥
सती भई सो बात बताई।
आज्ञा दई सो मात बताई॥
गांव बाहेर वह स्थान बताया।
जहां सती तिरशूल लगाया॥
जालीराम बहुरि समझावा।
धीरज बहुत भाँति बंधावा॥
अब चलिए जहाँ भस्म बसाई।
हेतु सती मन्दिर बनवाई॥
॥दोहा॥
जालीराम आये जहाँ, भस्म त्रिशूल सुहाय।
मंदिर अति सुंदर बना, सबके मन को भाय॥२२॥
॥चौपाई॥
मंदिर देखि सकल हरषाने।
घंट घड़ावल धुनि सुहाने॥
नित्य आय पूजा जन करहिं।
पुष्प, नारियल, दूब चढ़ावहिं॥
सती जाय कर पति के पासा।
सेवा करने लगी सुपासा॥
द्वादश सती हुई कुल मांई।
सत की जोत अखंड जलाई॥
नाराणी थी सबसे पहली।
जिसकी जोत जगत में फैली॥
कछुक दिवस पति की सेवा कर।
हुई प्रगट झुँझुनू में आकर॥
वैश्य एक था झुँझुनू मांही।
था सम्पन्न व्यापार चलाही॥
एक रात डाकू घर आये।
बनिये को घर से हर लाये॥
जाय छोड़ दिया जंगल मांही।
एकल पड़ गया राह भुलाहीं॥
॥दोहा॥
तभी एक देवी सुभग, लालटेन ले हाथ।
बोली आ पीछे मेरे, नहीं छोड़ना साथ॥२३॥
॥चौपाई॥
बनिया कुशल गांव पहुँचाई।
सपने में दिया दरश सुहाई॥
पूजा करो नित्य मन लाई।
यह आज्ञा सती मात सुनाई॥
जो मन से मुझको ध्यायेगा।
नाना सुख सम्पत्ति पायेगा॥
रोग दुःख कुछ निकट न आये।
जो नर मेरा ध्यान लगाये॥
अंतर्ध्यान भई सती माता।
वैश्य सभी को बात बताता॥
बात सकल गांवों में आई।
सत की जीत चहुँ दिशि छाई॥
यात्री आने लगे झुँझुनू।
तीर्थ बन गया गांव झुँझुन॥
हर सम्वत् भादव महिना को।
मेला भरे प्रति मावस को॥
॥दोहा॥
पूजने लगि संसार में, सतियों की सिर मोर।
पाठ, भजन होने लगे, दुनियां में चहुँ ओर॥२४॥
॥चौपाई॥
‘राणी सती’ है नाम सुहाना।
‘दादी’ नाम सकल जग जाना॥
है प्रत्यक्ष कलियुग में माता।
जो ध्याता अभिमत फल पाता॥
आस सभी की पूरण वारी।
दादी माँ तेरो नाम सुखारी॥
प्रति मावस जो पाठ कराई।
दीपक ज्योत अखंड जलाई॥
मानस पाठ अखंड कराई।
घर में कभी अनिष्ट न आई॥
जो नर पाठ करे प्रति दिवसा।
विघ्न हरे पूरे सब मनसा॥
और गुप्त एक बात बताऊँ।
दादी के मन की दर्शाऊँ॥
नवमी जन्म, ब्याह नवमी का।
सती भई सो दिन नवमी का॥
लगता मुझे बहुत शुभकारी।
नवमी का दिन मंगल कारी॥
नवमी के दिन जो व्रत राखे।
घर में वास करूँ मैं ताके॥
कृष्ण जन्म मम जन्म एक तिथि।
जन्म राम का भी नवमी तिथि॥
॥दोहा॥
नवमी बदि प्रति मास को, व्रत का नियम निभाय।
सुंदर पुत्र खिलायसी, पति के मन को भाय॥२५॥
॥चौपाई॥
दादी जी की आज्ञा पाई।
बना चरित सुंदर सुख दाई॥
कहँ दादी का चरित अपारा।
कहँ मति मोरी अपढ़ गंवारा॥
सत की महिमा सकी न गाई।
शेष, शारदा गये थकाई॥
जय-जय-जय-नाराणी माता।
निशदिन तुमको शीश नवाता॥
भक्ति विमल देवो अब माता।
चरणों में तेरे शीश नवाता॥
मंगल कारण चरित तुम्हारा।
सकल सिद्धि का देवन हारा॥
आशा पूर्ण करो मेरे मन की।
विपदा हरो मात जन जन की॥
जय जय कार करे नर नारी।
लेत नाम जन होय सुखारी॥
जय जगदम्बे मात भवानी।
तनधन प्रिया मात नाराणी॥
नाम तेरो लक्ष्मी महाराणी।
एक जनम शंकर प्रिया जानी॥
एक जनम तेरो नाम भवानी।
रघुवर प्रिय सीता महाराणी॥
राधा, रुकमण नाम तुम्हारा।
कृष्ण प्रिया जाने संसारा॥
नाम कहाँ तक गिनूँ तुम्हारे।
और अनेक चरित्र सुखारे॥
सब विधि तुम हो पूरण कामा।
कलि अवलम्ब तुम्हारो नामा॥
नाम लेत उतरहीं नर पारा।
सज्जन मन में करो विचारा॥
नाराणी करुणामयी माता।
हाथ जोड़ कर शीश नवाता॥
कष्ट निवारणि विपद विदारणि।
रमा उमा दादी सुहासिनी॥
सुन्दर दयावान भय हारी।
भक्त बछल माता अधिकारी॥
॥दोहा॥
ब्रह्मा, विष्णु, महेश अरु, ब्रह्माणी गुण खानि।
रमा, उमा का रूप है, राणी सती महारानि॥२६॥
॥चौपाई॥
जय दुर्गे ब्रह्माण्ड निकाया।
अगम-निगम है तेरी माया॥
नखत तुम्हारा मुकुट सजाये।
सूर्य, चन्द्र बलिहारी जायें॥
परमानन्द ग्यान की दाता।
परम सती नाराणी माता॥
दरश सुकोमल शांति दाता।
सकल जगत की भाग्य विधाता॥
कर त्रिशूल अरु शंख बिराजे।
दरशन से दारुण दुख भाजे॥
रोग शोक सब कष्ट निवारिणि।
जग पालक माता नारायणि॥
गाँव झुँझुनू वास तिहारो।
कष्ट हरो मां दास तिहारो॥
मंदिर भव्य बरनि नहिं जाई।
दरशन दारुन दुःख नसाइ॥
माया तेरी अपरंपारा।
पावन तेरे सत की धारा॥
मैं सेवक मूरख अज्ञानी।
आया शरण जोड़ जुगपानी॥
मंगल रचा आयसू पाई।
जो सुनता सब कष्ट नसाई॥
घर बैठाय सुने नर नारी।
प्रेम सहित आरती उतारी॥
मनवांछित फल वो पायेंगे।
दादी की किरपा पायेंगे॥
सब प्रकार दादी सिरु नाई।
करहुँ समाप्त कथा सुखदाई॥
॥दोहा॥
इस मंगल को जो सुने, विधिवत पाठ बैठाय।
मन इच्छा पूरी करे, दादीजी खुद आय॥२७॥
सकल देव घर जाइये, रहिये देव गणेश।
रिद्धि, सिद्धि, लक्ष्मी, धनद, करिये वास हमेश॥२८॥
नाराणी करुणामयी, तनधन जी संग आय।
कारज सबके सारियो, हे भय हारिणि माय॥२९॥
हाथ जोड़ विनती करें, खड़े तुम्हारे दास।
राणी सती दादी करो, मन मंदिर में वास॥३०॥
भक्त सभी घर जाइये, राणी सती चितलाय।
“रमाकांत” हे स्वामिनी! देवो वर मन भाय॥३१॥
卐 बोलो श्री राणी सती मात की जय 卐
॥इति शुभम्॥